विदिशा के ढोलखेड़ी गांव में दीपावली की तैयारियां शुरू हो गई हैं। यहां कुम्हार परिवार मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हैं। लेकिन इन दीयों के साथ जुड़ी पारंपरिक कला के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे हैं।
गांव के 65 वर्षीय प्यारेलाल प्रजापति पिछले 30 साल से मिट्टी के बर्तन और दीये बना रहे हैं। वे रोजाना करीब एक हजार दीये तैयार करते हैं। प्यारेलाल के मुताबिक, ढोलखेड़ी में करीब 10 परिवार इस काम से जुड़े हैं और गांव में एक लाख से ज्यादा दीये तैयार किए जाते हैं।
हालांकि, बदलते समय के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ाने की चुनौती भी सामने है। प्यारेलाल के दोनों बेटों को मिट्टी के बर्तन बनाने का काम आता है, लेकिन फिलहाल उनकी इसमें रुचि नहीं है। बड़ा बेटा ट्रक चलाता है, जबकि छोटा बेटा ऑटो चलाता है।
प्यारेलाल को उम्मीद है कि भविष्य में उनके बेटे इस काम को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन उन्हें चिंता है कि कहीं उनके बाद मिट्टी के दीये बनाने की यह परंपरा खत्म न हो जाए।
दीपावली पर मिट्टी के दीये घरों को रोशन तो करेंगे, लेकिन सवाल यही है कि क्या आने
