
महाकौशल की डायरी
अविनाश दीक्षित
नगरीय निकाय चुनाव के लिए वक्त कम बचा है लिहाजा वार्ड स्तर पर सियासी पैंतरेबाजी शुरू हो गई है। कटनी नगर निगम में पिछले चुनाव में जनता ने भाजपा को आईना दिखाते हुए निर्दलीय प्रीति सूरी को महापौर की कुर्सी पर बैठा दिया, यद्यपि विकास कार्यों को गति देने के नाम पर कुछ वक्त उपरांत उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। अब तक के कार्यकाल में सूरी ने सभी वार्ड में विकास कार्य कराने पर पूरा जोर भी लगाया, बावजूद इसके वह अपनी ही पार्टी के पार्षदों के सियासी हमलों का सामना करतीं रहीं। आलम यह रहा कि सदन की बैठकों में जो काम विपक्षी पार्षदों को करना चाहिए वह काम भाजपा के पार्षद करते रहे और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है।
बीते सप्ताह भी कुछ ऐसा नजारा फिर दिखाई दिया। दरअसल इंदिरा गांधी वार्ड के पार्षद ओमप्रकाश उर्फ बल्ली सोनी ने उनके वार्ड में विकास कार्य न होने का आरोप लगाते हुए निगम अध्यक्ष को इस्तीफा सौंप दिया। खबर है कि निगमाध्यक्ष ने बल्ली सोनी को इस्तीफा लौटा दिया। इसके बाद पार्षद सोनी का मीडिया के समक्ष बयान आया कि वह अब कलेक्टर को इस्तीफा सौंपेगें, किन्तु कई दिन बीतने के बाद भी वह इस कार्य को कर नहीं पाए हैं। नगर निगम गलियारों में अब सवाल पूछा जा रहा है कि यदि ओमप्रकाश बल्ली सोनी को इस्तीफा देना ही था तो वह सीधे कलेक्टर को सौंप देते, ताकि संभागायुक्त इसे स्वीकार कर लेते। चर्चाओं में यह बात भी हो रही है कि अगर वह इस्तीफा देने की हद तक असंतुष्ट रहे तो फिर चार साल तक इंतजार क्यों करते रहे..
दरअसल कटनी नगर निगम में अब तक भाजपा पार्षद दो गुटों में बंटे हुए नजर आए हैं। एक गुट जहां महापौर प्रीति सूरी के साथ साथ खड़ा नजर आता है तो दूसरे गुट को नगर निगम के ही शीर्ष जनप्रतिनिधि का सहारा मिलता रहा है। यही वजह है कि नगर निगम सदन में जब भी बैठकें हुईं, ज्यादातर हंगामाखेज रहीं, जिनमें अनुशासनहीनता के दृश्य भी देखे गए। पार्षद ओमप्रकाश सोनी का इस्तीफा अब भी चर्चाओं के केंद्र में है, कोई इसे राजनैतिक ड्रामेबाजी बता रहा है तो कोई इसे आने वाले चुनाव में संभावित पराजय से जोड़ रहा है। इन सबके बीच सवाल भाजपा के जिला संगठन पर भी उठाए जा रहे हैं, पूछा जा रहा है कि नगर निगम में अपनी ही पार्टी की फजीहत जिलाध्यक्ष को दिखाई क्यों नहीं पड़ रही है? फिलहाल भाजपा पार्षदों की गुटबाजी के बीच कांग्रेस न केवल सत्तापक्ष पर हमलावर है, बल्कि सियासी लाभ लेने की जुगत में जुट गई है।
आखिर विधायक को इतना दर्द क्यों हुआ..?
हमेशा अपने बयानों के कारण सुर्खियों में रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, प्रदेश सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर रह चुके और वर्तमान में पाटन विधानसभा क्षेत्र के विधायक अजय विश्रोई एक बार फिर से चर्चाओं का केंद्र बने.. इस बार वजह नगर निगम आयुक्त आईएएस ऑफिसर रामप्रकाश अहिरवार को लेकर सोशल मीडिया में की गई पोस्ट रही। पोस्ट में उन्होंने राज्य सरकार द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के तबादले पर व्यंग तीर चलाया और लिखा कि दशहरे के दिन जबलपुर के राम का हरण हो गया….बस फिर क्या था विधायक के फेसबुक पेज पर की गई इस पोस्ट पर बहुत सारी प्रतिक्रियाएं सामने आईं.. किसी ने इसका विरोध किया तो किसी ने विधायक पर ही तंज कसा। तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने के बाद अंत में विधायक को ये पोस्ड डिलीट करनी पड़ गई। विदित हो कि कुछ दिन पहले नगर निगम कमिश्नर रामप्रकाश अहिरवार का तबादला भोपाल हो गया। उधर कांग्रेस व अन्य संगठन से जुड़े नेताओं ने भी भाजपा विधायक पर निशाना साधा और स्पष्ट प्रतिक्रियाएं दीं कि नेताजी राजनीति से भगवान के नाम को तो कम से कम दूर रखो… इस प्रतिक्रिया से ये तो साफ था कि राजनैतिक मैदान की जंग में विधायक को घेरने का प्रयास शुरू हो चुका है। खबर है कि विधायक के कहने पर मातहत ने जो पोस्ट की उसे भी नेताजी की खूब खरी खोटी सुनने को मिली। जिसके बाद मजबूर मातहत ये कहता भी नजर आया कि साहब इसमें मेरी क्या गलती है आपने जो कहा उसे मैंने पोस्ट कर दिया। कुल मिलाकर इस पूरे मामले ने एक बार फिर से ये स्पष्ट किया कि राजनीति जब शुरू होती है तो फिर उसमें धर्म हो या आस्था सारे दांवपेंच नेताओं द्वारा लगाने शुरू कर दिए जाते हैं। खबर तो ये भी है कि जिस आई ए एस के लिए ये पोस्ट की गई उन्हें भी इस पोस्ट से काफी धक्का लगा है क्योंकि साहब ने विधायक जी के कई काम चुटकी में करवाए थे और फिर विधायक ने उन्हें चर्चाओं का केंद्र बना दिया। विरोधी खेमे में चर्चाएं तेज ये भी थीं कि विधायक को आखिर इतना दर्द क्यों हो रहा है, ये तो प्रशासनिक फेरबदल का एक हिस्सा था कि साहब का ट्रांसफर हो गया।
