आस्था की राह पर दिग्विजय, सियासी सवाल भी साथ

मध्य क्षेत्र की डायरी…

 

संदीप चंसौरिया

 

सियासत में समय और रास्ते, दोनों के अपने मायने होते हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक बार फिर लंबी पदयात्रा पर हैं. इस बार रास्ता उज्जैन के महाकाल से अयोध्या के राम मंदिर तक का है. 20 अक्टूबर को विजयादशमी पर शुरू हुई करीब 930 से 950 किलोमीटर की सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा लगभग 70 दिन में पूरी करने की योजना है. ओरछा के रामराजा मंदिर से होते हुए अयोध्या पहुंचने वाली इस यात्रा में दिग्विजय रोज करीब 15 किलोमीटर चलने का लक्ष्य लेकर निकले हैं. दिग्विजय के लिए पैदल चलना नया नहीं है. 30 सितंबर 2017 को उन्होंने नर्मदा परिक्रमा शुरू की थी, जो अप्रैल 2018 में पूरी हुई. पत्नी अमृता राय और सहयोगियों के साथ करीब 3,300 किलोमीटर की इस यात्रा को उन्होंने धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान बताया था. हालांकि, यात्रा मध्य प्रदेश के करीब 110 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरी और इसके कुछ ही महीनों बाद नवंबर 2018 में विधानसभा चुनाव हुए. कांग्रेस ने चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर किया और सरकार बनाई. यात्रा ने राजनीतिक चर्चाओं को जरूर हवा दी, लेकिन उसकी चुनावी सफलता में निर्णायक भूमिका साबित करना अलग बात है. अब कैलेंडर फिर दिलचस्प है. अगला लोकसभा चुनाव 2029 में होना है और दिग्विजय ने उससे पहले धार्मिक आस्था के केंद्रों को जोड़ने वाला रास्ता चुना है. मगर इस बार एजेंडे में केवल आस्था नहीं, बल्कि मंदिरों के चढ़ावे में पारदर्शिता और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के मुद्दे भी हैं. दिग्विजय इन्हें ‘दान की चोरी’ और ‘वोट की चोरी’ का सवाल बताते हैं. अब दिलचस्प यह है कि क्या यह यात्रा कांग्रेस के लिए नए राजनीतिक विमर्श की जमीन तैयार करेगी, या दिग्विजय की घोषित धार्मिक-सामाजिक पहल तक सीमित रहेगी? फिलहाल इतना तय है कि महाकाल से अयोध्या तक का रास्ता धार्मिक होने के साथ राजनीतिक नजरों से भी ओझल नहीं रहेगा.

तंत्र में खेला…पांच रुपये की फिनाइल 33 हजार में 

सरकारी खजाना जनता की गाढ़ी कमाई से भरता है, लेकिन मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में खरीदारी के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे व्यवस्था की नीयत और निगरानी, दोनों पर सवाल खड़े करते हैं. पांच रुपये में खरीदे गए एक लीटर फिनाइल की कीमत दूसरे निकाय में 33,500 रुपये दर्ज होना, 306 रुपये की एलईडी का 11,800 रुपये में खरीदा जाना और दो लाख की कचरा गाड़ी के लिए छह लाख रुपये खर्च करना सामान्य खरीद का अंतर नहीं लगता. यही वे आंकड़े हैं, जिन्होंने सरकारी तंत्र के भीतर चल रही कथित गड़बड़ियों की परतें खोल दी हैं. हैरानी यह भी है कि यह खुलासा किसी विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे की विभागीय बैठक में प्रस्तुत विश्लेषण से हुआ. वीडियो सार्वजनिक करने की मंशा भले न रही हो, लेकिन उसके वायरल होने से सरकार के अपने ही तंत्र की तस्वीर जनता के सामने आ गई. प्रस्तुति के मुताबिक, 374 नगरीय निकायों ने तीन साल में जीइएम पोर्टल से 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की. उचित औसत दरों पर खरीद होती तो करीब 250 करोड़ रुपये बचाए जा सकते थे. सवाल सिर्फ इतना नहीं कि किसने महंगा सामान खरीदा. सवाल यह है कि खरीद की मंजूरी किसने दी, दरों की तुलना क्यों नहीं हुई और भुगतान से पहले जिम्मेदार अधिकारियों ने जांच क्यों नहीं की? बेशक, कीमतों का अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं है. गुणवत्ता, तकनीकी विशेषताओं और आपूर्ति की शर्तों की जांच जरूरी है. लेकिन, यही जांच अब निष्पक्ष और सार्वजनिक जवाबदेही के साथ होनी चाहिए. मंत्री प्रतिमा बागरी ने उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिया है. अब जनता को आश्वासन नहीं, नतीजे चाहिए.

Next Post

दशहरा मिलन में क्षत्रियाणियों ने किया घूंमर नृत्य 

Sat Oct 24 , 2026
सीधी। राजपूताना क्लब सीधी द्वारा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी टाटा कालेज जमोड़ी सीधी सभागार में दशहरा मिलन समारोह का आज आयोजन किया गया। दशहरा मिलन समारोह में राजपूताना क्लब सीधी की क्षत्रियाणियों द्वारा परम्परागत तरीके से घूंमर नृत्य की सराहनीय प्रस्तुति दी गई। Facebook Share on X […]

You May Like