अनिल कुंबले का आज है जन्मदिन, टूटे जबड़े से गेंदबाजी, 10 विकेट और वो यादगार शतक

नयी दिल्ली, अनिल कुंबले आज, शनिवार 17 अक्टूबर को अपना 56वां जन्मदिन मना रहे है। आइए उनके इस खास जन्मदिन पर जानते है कैसा रहा उनका करियर और क्रिकेट में कैसा रहा रिकॉर्ड।
  • अनिल कुंबले 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ एक टेस्ट पारी में सभी 10 विकेट चटकाए।
  • कुंबले ने 132 टेस्ट मैचों में 619 विकेटों के साथ भारत के सबसे सफल गेंदबाज रहे।
  • कुंबले को 2005 में ‘पद्म श्री’ और 2015 में ‘आईसीसी हॉल ऑफ फेम’ में शामिल किया गया।

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान, कोच और कमेंटेटर अनिल कुंबले का आज, शनिवार 17 अक्टूबर को 56वां जन्मदिन हैं। इनका जन्म 17 अक्टूबर 1970 को कर्नाटक के बेंगलुरू में हुआ था। भारतीय क्रिकेट इतिहास के महानतम लेग स्पिनरों में शुमार अनिल कुंबले आज अपना 56वां जन्मदिन मना रहे हैं।

वह आज 56 वर्ष के भी हो गए है। करीब 18 वर्षों के अपने शानदार अंतरराष्ट्रीय करियर में कुंबले ने टेस्ट और वनडे प्रारूप में भारत का प्रतिनिधित्व किया और टीम के कप्तान व मुख्य कोच की भूमिका भी निभाई।

महान स्पिनर अनिल कुंबले का सफर
बचपन में बीएस चंद्रशेखर जैसे दिग्गजों को देखकर क्रिकेट की ओर आकर्षित हुए कुंबले ने 19 वर्ष की आयु में कर्नाटक के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया। इसके तुरंत बाद, 1990 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा और क्रिकेट जगत में तहलका मचाते हुए कई रिकॉर्ड स्थपित किए जो आज भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज है।

करियर और ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स
अपने पूरे करियर में कुंबले ने 132 टेस्ट मैचों में 619 विकेट चटकाए। वर्ष 2008 में जब उन्होंने संन्यास लिया, तब वे टेस्ट इतिहास में सर्वकालिक तीसरे सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज थे। कुंबले के करियर का सबसे ऐतिहासिक क्षण 1999 में आया, जब उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ दिल्ली टेस्ट की एक पारी में सभी 10 बल्लेबाजों को आउट किया। वे इंग्लैंड के जिम लेकर के बाद यह कारनामा करने वाले दुनिया के दूसरे गेंदबाज बने।

अनिल कुंबले परंपरागत स्पिनरों के विपरीत रहे
1996 का विश्व कप उनके लिए बेहद सफल रहा, जहां वे 7 मैचों में 15 विकेट लेकर टूर्नामेंट के सबसे सफल गेंदबाज बने। परंपरागत स्पिनरों के विपरीत, कुंबले गेंद को बहुत ज्यादा टर्न कराने के बजाय अपनी सटीक लाइन-लेंथ, गति और उछाल पर निर्भर रहते थे।

इसी वजह से उन्हें “जंबो” उपनाम दिया गया, क्योंकि उनकी गेंदें एक स्पिनर के लिहाज से काफी तेज होती थीं। वह 2002 आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी जीतने वाली संयुक्त भारतीय टीम का भी हिस्सा रहे।

पुरस्कार और सेवानिवृत्ति के बाद की भूमिका
कुंबले को 1993 में ‘क्रिकेटर ऑफ द ईयर’ और 1996 में ‘विस्डेन क्रिकेटर ऑफ द ईयर’ चुना गया। भारत सरकार ने उन्हें 2005 में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाजा। नवंबर 2008 में संन्यास लेने के बाद भी वे क्रिकेट से जुड़े रहे। 2012 में उन्हें आईसीसी (ICC) क्रिकेट समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और फरवरी 2015 में वे आईसीसी हॉल ऑफ फेम में शामिल होने वाले चौथे भारतीय खिलाड़ी बने।

इसके अलावा, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय टीम (2016-17) के साथ-साथ आईपीएल में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर, मुंबई इंडियंस और पंजाब किंग्स के मुख्य कोच के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं।

अनिल कुंबले का कैसा रहा अंतरराष्ट्रीय करियर
जंबो के नाम से मशहूर कुंबले का टेस्ट डेब्यू 1990 में इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर में हुआ। वहीं उन्होंने 2008 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना आखिरी टेस्ट मैच खेला था। कुंबले ने 2007 में अपना आखिरी वनडे मैच खेला था। वो भारतीय टीम के कोच भी रह चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने कई IPL टीमों के साथ भी अहम जिम्मेदारी निभाई।

वहीं उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी भी की है। उन्होंने साल 2002 में भारतीय टीम की एक वनडे मैच में कप्तानी की थी और इसमें बतौर कप्तान जीत दर्ज की थी। वहीं कुंबले ने साल 2007 से 2008 के बीच 14 टेस्ट मैचों में भारतीय टीम की कप्तानी की थी।

चौथे सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले गेंदबाज
कुंबले टेस्ट क्रिकेट इतिहास में श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन, ऑस्ट्रेलिया के शेन वॉर्न और इंग्लैंड के जेम्स एंडरसन के बाद दुनिया के चौथे सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं। कुंबले जितने बेहतरीन गेंदबाज थे, उतने ही पक्के लोअर-ऑर्डर बल्लेबाज भी थे। उन्होंने टेस्ट में 2,506 रन बनाए हैं, जिसमें इंग्लैंड के खिलाफ (द ओवल, 2007) लगाया गया एक यादगार टेस्ट शतक (110) भी शामिल है।

साल 2002 का वो दौर जब उनका जबड़ा टूट गया था
साल 2002 में वेस्टइंडीज के खिलाफ एंटीगा टेस्ट में अनिल कुंबले का जबड़ा टूट गया था, लेकिन इसके बावजूद वे पट्टी बांधकर मैदान पर उतरे और महान बल्लेबाज ब्रायन लारा का विकेट लिया, जो क्रिकेट इतिहास के सबसे साहसी पलों में गिना जाता है। उन्होंने 14 टेस्ट मैचों में भारतीय टीम की कप्तानी की। संन्यास के बाद, वे साल 2016 से 2017 तक भारतीय टीम के मुख्य कोच भी रहे।

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