ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
भिंड में आजादी के बाद से लेकर अब तक 40 से अधिक बार कलेक्टर बदले जा चुके हैं। दरअसल, भिंड जिला अपने संवेदनशील राजनैतिक और प्रशासनिक परिदृश्य के कारण अक्सर सुर्खियों में रहता है, यही वजह है कि यहाँ कलेक्टर्स के जल्दी जल्दी तबादले होते हैं। कभी बागी समस्या के लिए चर्चित रहे चंबल के इस बड़े जिले में एक साल होते ही फिर कलेक्टर बदल दिए गए हैं। किरोड़ी लाल मीणा अक्टूबर 2025 से अक्टूबर 2026 तक यानि कुल 366 दिन कलेक्टर रहे। सवाल पूछे जा रहे हैं कि वे सिर्फ एक साल ही कलेक्टर क्यों रह पाए, उनके नजदीकियों की मानें तो वे खुद भिंड में रहना नहीं चाहते थे।
साल भर में भी वे चंबल के मिजाज में खुद को नहीं ढाल पाए। कहा यह भी जा रहा है कि आर्म्स लाइसेंस विवाद और जनप्रतिनिधियों से तालमेल की कमी के चलते उनका तबादला मंत्रालय में कर दिया गया है। बहरहाल, अब पवन कुमार जैन के हाथों में भिंड की कमान है। इससे पहले संजीव श्रीवास्तव को पिछले साल इसी महीने भिंड की कलेक्टरी से रुखसत कर दिया गया था। उन्होंने स्थानीय भाजपा विधायक नरेन्द्र सिंह से पंगा मोल ले लिया था, इसके बाद कलेक्टरी उनके हाथ से जाना ही थी। देखना है कि नए कलेक्टर अपने पूर्ववर्तियों की गलतियों से किस हद तक सबक सीखकर अपने कार्यकाल को लम्बा खींच पाते हैं।
पहले भड़ास निकाली, फिर दिया वफ़ादारी का हलफनामा
सिंधिया के नेतृत्व में काम कर रहे संचार मंत्रालय ने बीते रोज दूरसंचार एडवाइजरी कमेटी का ऐलान किया तो सिंधिया खेमे की फूट खुलकर सामने आ गई। कमेटी में आने से वंचित रहे तमाम चेहरे अपना कष्ट तमाम कोशिश के बावजूद छिपा नहीं सके और सोशल मीडिया पर पोस्ट कर अपनी बरसों पुरानी वफादारी का कोई मोल न होने पर रंज जताने लगे। जब महल की ओर से लानत मलानत की गई तो इन्हीं लोगों ने सोशल मीडिया पर दोबारा पोस्ट कर सिंधिया के प्रति वफादारी का हलफनामा भी दिया। बहरहाल, ग्वालियर के लिए गठित दूरसंचार एडवाइजरी कमेटी में दिनेश जैन, पुनीत शर्मा पप्पन, सतेंद्र तोमर और पुरुषोत्तम भार्गव जैसे पुराने महल समर्थक जगह बनाने में कामयाब रहे हैं।
प्रतिमा नहीं लगी लेकिन अंबेडकर धाम के लिए दिन-रात काम
सवर्ण संगठनों के विरोध के चलते यहां हाईकोर्ट परिसर में भले ही अंबेडकर प्रतिमा अब तक स्थापित नहीं हो सकी हो लेकिन शहर से बीस किमी दूर करोड़ों की लागत से अंबेडकर धाम बनाने का काम दिन रात जारी है। रकम कम पड़ी तो सीएम के निर्देश पर दूसरे चरण के कामों के लिए रकम भी तत्काल मंजूर हो गईं। आज बुधवार को सरकार के दो कैबिनेट मंत्रियों सिलावट और नारायण सिंह ने अंबेडकर धाम पहुंचकर अपडेट लिया तो सीएम सहित कई बड़े नेता यहां पहले ही निरीक्षण कर चुके हैं। हालांकि आंबेडकर धाम को लेकर सवर्ण संगठनों की ओर से कोई बड़ा विरोध नहीं उभरा है। सरकार की भी कोशिश है कि 28 के चुनाव से पहले अम्बेडकर धाम बनकर तैयार हो जाए।
धनाढ्यों के क्लब में चुनावी शंखनाद…

यूं तो हर पांच साल बाद लोकसभा, विधानसभा और निकाय के चुनाव आने के बाद ही चुनावी माहौल सरगर्म रहता है लेकिन ग्वालियर शहर हर वक्त चुनावी मोड में है। पहले चेंबर ऑफ कॉमर्स और दाल बाजार के चुनाव हुए और हाल में चार हजार मेंबरों वाले अचलेश्वर ट्रस्ट के चुनाव के चलते पूरे शहर में चुनावी रंगत रही। इन तीन चुनावों के निबटने के बाद अब एक और बड़े चुनाव का ऐलान हो गया है। हम बात कर रहे हैं करीब सवा सौ साल से शहर के बड़े धनाढ्यों और नव धनाढ्यों की गतिविधियों के केन्द्र रहे जीवाजी क्लब की, जिसके चुनाव बीस दिसंबर को कराए जाने का ऐलान हो गया है। हालांकि मौजूदा पदाधिकारी इन चुनावों को मार्च तक के लिए टालना चाहते थे लेकिन हंगामेदार एजीएम में परिवर्तन के पैरोकारों का धड़ा 20 दिसंबर की तारीख मुकर्रर कराने में कामयाब रहा। सिंधिया परिवार द्वारा रियासत के दौर में स्थापित इस क्लब का स्वरूप भले ही गैर-राजनीतिक रखा गया है लेकिन हाल के बरसों में यहां चेंबर ऑफ कॉमर्स की ही तरह साफ तौर पर सियासी दखलंदाजी देखने को मिली है। कुछ पदाधिकारी सिंधिया परिवार के पारंपरिक समर्थक हैं तो कुछ ने अपनी निष्ठाएं नरेन्द्र सिंह तोमर से जोड़ ली हैं। महत्वाकांक्षा के चलते कुछ पदाधिकारी जीवाजी क्लब के रास्ते मुख्यधारा की राजनीति में पदार्पण कर सफलता के सोपान तय करना चाहते हैं। जीवाजी क्लब में वर्तमान में लगभग 3,000 मुख्य सदस्य और करीब 12,000 डिपेंडेंट सदस्य जुड़े हुए हैं। वोट का अधिकार मुख्य सदस्यों को ही होगा। जीवाजी क्लब में नए सदस्यों की आमद को कंट्रोल करने के लिए ही इस बार से मेंबरशिप फीस भी बढ़ाकर साढ़े छह लाख कर दी गई है। हालांकि कुछ सदस्य इसे दस लाख कराने पर अड़े हुए थे। बहरहाल, शहर का धनाढ्य तबका अगले दो महीने तक चुनावी दांवपेंचों में उलझा रहेगा।
