भोपाल। परम पूज्य आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने जैन धर्म के ग्रंथराज समयसार के स्वाध्याय के दौरान वैराग्य, संयम और आत्मचिंतन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संसार की अनित्यता को समझकर ही मनुष्य आत्मकल्याण और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
स्वाध्याय में बताया गया कि द्रव्य अपने मूल स्वरूप में शाश्वत रहता है, जबकि उसकी पर्याय निरंतर बदलती रहती है। जिस प्रकार मनुष्य का शरीर बाल्यावस्था से युवावस्था और वृद्धावस्था तक पहुंचता है, उसी प्रकार संसार की सभी वस्तुएं परिवर्तन के अधीन हैं। इस सत्य को समझने से सांसारिक सुख-सुविधाओं और वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम होती है।
मीडिया प्रभारी भविष्य जैन ने बताया कि स्वाध्याय में आत्मा के चैतन्य स्वरूप को समझने और बाहरी वस्तुओं में स्थायी सुख तलाशने के बजाय आत्मस्वरूप की पहचान करने पर जोर दिया गया।
प्रवचन में कहा गया कि काम, क्रोध, राग और द्वेष से ऊपर उठना आत्मकल्याण के लिए आवश्यक है। सांसारिक संबंधों और दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी अनावश्यक मोह और परिग्रह से बचना चाहिए। प्रत्येक जीव को अपने कर्मों के अनुसार फल भोगना पड़ता है, इसलिए जीवन में सदाचार, विवेक और संयम को महत्व देना चाहिए।
आचार्य शांतिसागर जी महाराज के प्रेरक संदेश “डरो नहीं, घबराओ नहीं, संयम धारण करो” का स्मरण करते हुए धैर्य, आत्मबल और अनुशासन बनाए रखने की प्रेरणा दी गई।
स्वाध्याय का सार यह रहा कि आत्मचिंतन, वैराग्य और राग-द्वेष से मुक्ति के माध्यम से आत्मशुद्धि तथा मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है।
