भोपाल। मां दुर्गा की प्रतिमा बनाते वक्त आपने एक बात जरूर नोटिस की होगी… मां का चेहरा पूरा होने के बाद भी आंखें आखिर में ही बनाई जाती हैं। लेकिन इसके पीछे सिर्फ कला नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था भी जुड़ी है।
प्रतिमा की आंखें बनाने की इस परंपरा को ‘चक्षुदान’ कहा जाता है—यानी मां को नेत्र अर्पित करना।
मान्यता है कि आंखें ही मां की प्रतिमा को जीवंत भाव देती हैं। इसीलिए आंखें बनाने का काम बेहद सावधानी और एकाग्रता से किया जाता है और पारंपरिक रूप से इसे अनुभवी मूर्तिकार ही करते हैं। हालांकि हमने जब मूर्तीकार से इस बारे में बात की तो उन्होंने हमें बताया, अब मूर्ती में रंग बाद में किया जाता है अगर पहले आंखें खोल दी तो नेत्र खराब हो जाएंगे इसलिए सबसे आखिरी में आंखे खोला जाती हैं।
बदलते दौर में परंपरा के साथ-साथ कई बदलाव हुए हैं मूर्ती को लेकर कई मान्यताएं है तो कारिगरों के अपने कुछ तरीके हैं.
यानी…
मां की प्रतिमा का आखिरी स्पर्श रंग की लकीर के साथ-साथ, आस्था में ‘चक्षुदान’ का बेहद खास क्षण है।
