ओटावा, 06 अक्टूबर (वार्ता) कनाडा के क्यूबेक प्रांत के चुनाव में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। अलगाववादी दल ‘पार्टी क्यूबेकोइस’ (पीक्यू) ने जबरदस्त जीत दर्ज करते हुए सत्ता में वापसी कर ली है, जबकि 2018 से शासन कर रही सत्तारूढ़ दल ‘कोलिशिन अवनीर क्यूबेक’ (सीएक्यू) का पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो गया है। इस ऐतिहासिक चुनाव के बाद क्यूबेक का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया है।
पॉल सेंट-पियरे प्लैमंडन के नेतृत्व वाली पीक्यू ने वर्ष 2022 की अपनी महज तीन सीटों में अभूतपूर्व सुधार करते हुए 127 सदस्यीय नेशनल असेंबली में 59 सीटों पर जीत हासिल की है। पार्टी हालांकि बहुमत के 64 के आंकड़े से चूक गयी और अब वह अल्पमत सरकार बनाएगी। वहीं, केवल चार वर्ष पहले भारी बहुमत हासिल करने वाली सीएक्यू का खाता तक नहीं खुला और निवर्तमान प्रीमियर (मुख्यमंत्री) क्रिस्टीन फ्रेशेट अपनी सीट भी नहीं बचा सकीं।
चुनाव में लिबरल पार्टी ने शानदार वापसी करते हुए 19 से बढ़कर 40 सीटों पर कब्जा जमाया है और वह मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में होगी। लिबरल नेता चार्ल्स मिलियार्ड ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी सरकार के कामकाज में सहयोग करेगी, लेकिन स्वतंत्रता पर किसी भी जनमत संग्रह का पुरजोर विरोध करेगी। दूसरी ओर, कंजर्वेटिव पार्टी ने पहली बार 19 सीटें जीतकर विधानसभा में ऐतिहासिक प्रवेश किया है।
अपनी जीत के बाद श्री प्लैमंडन ने कहा कि वह क्यूबेक को एक स्वतंत्र देश बनाने के अपने सपने को पूरा करने और फ्रांसीसी भाषा एवं संस्कृति की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।
अल्पमत सरकार होने के कारण उन्हें जनमत संग्रह के लिए अन्य अलगाववादी दल ‘क्यूबेक सॉलिडेयर’ के समर्थन की आवश्यकता होगी। श्री प्लैमंडन ने संकेत दिया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल समाप्त होने तक जनमत संग्रह को टाला जा सकता है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि वह अंग्रेजी भाषी नागरिकों सहित सभी के ‘प्रीमियर’ के रूप में काम करेंगे।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने श्री प्लैमंडन को बधाई दी और व्यापार, अमेरिकी टैरिफ तथा आवास जैसे मुद्दों पर मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई। विश्लेषकों का मानना है कि क्यूबेक में अलगाववादी दल की वापसी और 19 अक्टूबर को अल्बर्टा में कनाडा से अलग होने पर होने वाले मतदान से देश की राष्ट्रीय एकता को लेकर नये सिरे से बहस छिड़ सकती है। इतिहास में पहली बार पीक्यू ने 30 प्रतिशत से भी कम लोकप्रिय वोट हासिल कर सरकार बनाएगी। इस परिणाम के बाद राज्य की वर्तमान ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ चुनावी प्रणाली को बदलने और आनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू करने की मांग तेजी से उठने लगी है।

