AI के साथ जीना सीखना होगा, इंदौर को बनाना होगा AI हब: पुष्यमित्र भार्गव महापौर 

इंदौर। अमेरिका का International Visitor Leadership Program (IVLP) का दो सप्ताह प्रवास कर के भारत वापस लौटे इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपने अनुभव संझा लिए उन्होंने बताया कि करीब 50-60 वर्षों से दुनिया के अलग-अलग देशों के लोगों को विभिन्न विषयों पर अमेरिका में हो रहे काम, उनके प्रभाव और भविष्य की संभावनाओं को समझने का अवसर देता रहा है। मुझे इस कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। महापौर ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए बताया कि ai यह हम चार साल यानी 2022 से प्रयोग कर रहे है लेकिन यह कोई अचानक बनी व्यवस्था नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमेरिका में पिछले 30-40 वर्षों में तैयार हुआ अनुभव और सिस्टम है।

महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने बताया कि इस यात्रा के दौरान अमेरिका के अलग-अलग राज्यों और शहरों में AI से जुड़े काम को करीब से समझने का अवसर मिला। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग और नेपाल सहित करीब आठ देशों के 12 लोगों ने अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में AI से जुड़े कॉलेज, यूनिवर्सिटी, कंपनियों और संस्थानों का अध्ययन किया।

*अमेरिका में सरकार से ज्यादा इंडस्ट्री कर रही AI का नेतृत्व*

अमेरिका में काम करने का तरीका भारत से काफी अलग है। भारत में यदि कोई नई तकनीक या क्षेत्र तेजी से विकसित होता है तो सरकार उसके लिए नीति बनाती है, जमीन, संसाधन और संस्थागत सहयोग उपलब्ध कराती है। अमेरिका में कई मामलों में इंडस्ट्री और निजी क्षेत्र पहले काम शुरू करते हैं। जब किसी स्तर पर नियम या नियमन की आवश्यकता महसूस होती है, तब सरकार उसमें हस्तक्षेप करती है।

महापौर ने कहा कि AI को लेकर अमेरिका में फिलहाल यही बहस चल रही है कि पूरे देश के लिए एक समान रेगुलेशन होना चाहिए या राज्यों और स्थानीय निकायों को अपने-अपने नियम बनाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

महापौर ने कहा कि अमेरिका के संघीय ढांचे को करीब से देखने का अवसर मिला। वहां राज्यों और स्थानीय निकायों के पास कई विषयों पर कानून और नीतियां बनाने का अधिकार है। यहां तक कि किसी शहर में कोई काम काम करना है या नहीं इसका फैसला भी कई बार स्थानीय प्रशासन करता है। कुछ शहरों ने अपने यहां डेटा सेंटर नहीं बनाने के प्रस्ताव तक पारित किए हैं।

*AI को रोकना नहीं, समझना और नियंत्रित करना जरूरी*

AI के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझ में आई कि आने वाले समय में हमें इसके साथ ही जीना होगा। इसलिए हर व्यक्ति को AI की बेसिक जानकारी और इसके इस्तेमाल की समझ होनी चाहिए। चाहे शिक्षा हो, व्यवसाय हो, नौकरी हो या परिवार से जुड़ा कोई काम हर क्षेत्र में AI का प्रभाव बढ़ने वाला है। इसलिए लोगों को AI की बेसिक ट्रेनिंग देना और उन्हें इसके सही इस्तेमाल के बारे में जागरूक करना जरूरी है।

साथ ही यह भी समझना होगा कि AI के फायदे जितने हैं, उसके जोखिम भी हैं। जब तक मशीन इंसान के नियंत्रण में है, तब तक स्थिति अलग है। लेकिन यदि किसी स्तर पर मशीन खुद निर्णय लेने और नियंत्रण अपने हाथ में लेने लगे तो उसके परिणामों पर दुनिया में गंभीर चर्चा हो रही है। अमेरिका ही नहीं, दुनिया के दूसरे देशों में भी इस विषय पर शोध और बहस चल रही है।

*AI के साथ प्राइवेसी भी बड़ी चुनौती*

अमेरिका के शहरों में डिजिटल गवर्नेंस तेजी से बढ़ रही है। सुरक्षा के लिए कैमरों और मॉनिटरिंग सिस्टम का इस्तेमाल हो रहा है। वाहनों की निगरानी, ट्रैफिक मॉनिटरिंग और शहरों की सुरक्षा में तकनीक का उपयोग बढ़ा है।लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी सामने आया। वहां के कई लोग इसे प्राइवेसी के अधिकार से जोड़कर देख रहे हैं। कौन सी गाड़ी कब गई, उसमें कितने लोग थे और उसकी पहचान क्या है इस तरह की जानकारी के बड़े पैमाने पर संग्रह को लेकर नागरिकों में सवाल हैं।यानी अमेरिका के शहरों में भी तकनीक को लेकर जागरूकता है, लेकिन उसके साथ चिंता और बहस भी है।

*बोस्टन की AI पॉलिसी से इंदौर सीख सकता है*

बोस्टन की सिटी गवर्नमेंट ने अपने स्तर पर AI पॉलिसी तैयार की है। इसमें यह तय करने की कोशिश की गई है कि नगर निगम के कर्मचारी AI का उपयोग किन कामों में कर सकते हैं, किन मामलों में सावधानी रखनी होगी और किन क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

यह इंदौर जैसे शहरों के लिए भी महत्वपूर्ण उदाहरण है। इंदौर पहले से डिजिटल गवर्नेंस के क्षेत्र में काम कर रहा है। डेटा डिजिटाइजेशन, घरों की जानकारी का डिजिटल रिकॉर्ड और नागरिक सेवाओं में तकनीक का इस्तेमाल यहां लगातार बढ़ रहा है।इसलिए इंदौर को केवल डिजिटल गवर्नेंस तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि AI को समझने और उसके उपयोग के लिए भी शहर में एक व्यवस्थित मॉडल विकसित करना चाहिए।

*नौकरियां खत्म नहीं होंगी, उनका स्वरूप बदलेगा*

AI को लेकर भारतीय युवाओं में सबसे बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है। अमेरिका में भी यह चर्चा है कि सामान्य सॉफ्टवेयर कोडिंग से जुड़ी कुछ नौकरियों की जरूरत भविष्य में कम हो सकती है। यही कारण है कि वहां H-1B वीजा और तकनीकी रोजगार को लेकर नीतिगत बहस भी जारी है।लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि AI के कारण काम खत्म हो जाएगा। काम का स्वरूप बदलेगा। Prompt Engineering, AI आधारित तकनीकी सेवाओं, शोध, शिक्षा, स्वास्थ्य और विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में नए अवसर पैदा होंगे।

महापौर ने कहा कि अमेरिका अभी भी अच्छे प्रोफेसर, डॉक्टर, शोधकर्ता और विशेषज्ञों को अवसर दे रहा है। इसलिए भारतीय युवाओं को केवल पारंपरिक सॉफ्टवेयर नौकरी पर निर्भर रहने के बजाय AI के साथ काम करने की क्षमता विकसित करनी होगी।

*शहरों की समस्याओं का समाधान भी AI से*

AI केवल कंपनियों और तकनीकी संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा। शहरों के संचालन में भी इसका प्रभाव बढ़ेगा।बोस्टन में स्कूल जाने वाले बच्चों को कम समय में सुरक्षित तरीके से घर से स्कूल और स्कूल से घर पहुंचाने के लिए इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट पर काम हो रहा है।

अमेरिका के कई शहरों में 15 से 20 मिनट के भीतर लोगों को घर से ऑफिस या अन्य जरूरी स्थानों तक पहुंचाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पैदल मार्ग और साइकिल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहां यह समझ विकसित की जा रही है कि शहर के स्वास्थ्य और नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए निजी वाहनों पर निर्भरता कम होनी चाहिए। पब्लिक ट्रांसपोर्ट, साइकिल और पैदल चलने को बढ़ावा दिया जा रहा है।

*होमलेसनेस और प्राइवेसी जैसी चुनौतियां वहां भी हैं*

अमेरिका को तकनीकी रूप से विकसित देश माना जाता है, लेकिन वहां के शहर भी अपनी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। सड़कों पर रहने वाले लोगों यानी होमलेसनेस की समस्या कई शहरों के लिए बड़ी चुनौती है।

इसी तरह डिजिटल गवर्नेंस और नागरिकों की प्राइवेसी के बीच संतुलन भी बड़ा सवाल है। यानी तकनीक विकसित होने के बावजूद शहरों की मूल समस्याएं खत्म नहीं होतीं। फर्क केवल इतना है कि उनके समाधान के लिए तकनीक के साथ नई नीतियां और नए मॉडल तलाशे जा रहे हैं।

*भारत के लिए AI में बड़ा अवसर*

AI को लेकर भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर यह है कि दुनिया में जितना डेटा तैयार हो रहा है, उसका इस्तेमाल रिसर्च, इंडस्ट्री और नए उत्पादों के विकास में किया जा सकता है।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में AI को लेकर जिस तरह काम शुरू किया है, वह महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर AI Impact Summit जैसे आयोजनों में दुनिया के देशों और विशेषज्ञों को एक मंच पर लाने का प्रयास हुआ है। भारत में AI हब विकसित करने की दिशा में भी काम चल रहा है।

महापौर ने कहा कि मेरी कोशिश है कि इंदौर को भी AI हब के रूप में विकसित करने की दिशा में काम हो। भोपाल को भी इससे जोड़ने का प्रस्ताव दिया गया है। इंदौर में शिक्षा संस्थानों, इंडस्ट्री, चैंबर ऑफ कॉमर्स और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर AI को लेकर काम शुरू किया जा सकता है।

*AI लिटरेसी अब समय की जरूरत*

अब सबसे जरूरी काम AI Literacy है। लोगों को यह बताना होगा कि AI क्या है, इसका उपयोग कैसे करना है और इसका दुरुपयोग कैसे रोका जा सकता है।यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। मीडिया, जनप्रतिनिधि, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन और उद्योग सभी को मिलकर लोगों को AI के बारे में जागरूक करना होगा।

हम यह नहीं कह सकते कि AI के बिना भविष्य चलेगा। इसलिए सवाल AI को स्वीकार करने या न करने का नहीं है। सवाल यह है कि हम इसे कितनी समझदारी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल करते हैं।

*अमेरिका में भारत और इंदौर को लेकर सकारात्मक नजरिया*

अमेरिका में स्थानीय लोगों, प्रोफेसरों, उद्योगों और भारतीय समुदाय के लोगों से बातचीत का अवसर मिला। कई लोगों का मानना है कि भारत के पास तकनीक के साथ-साथ अपनी सामाजिक और आध्यात्मिक समझ के कारण दुनिया को दिशा देने की क्षमता भी है।अमेरिका में रह रहे भारतीय समुदाय के लोगों से भी अलग-अलग शहरों में मुलाकात हुई। विशेष रूप से इंदौर से जुड़े लोगों ने मुलाकात कर शहर के लिए काम करने और योगदान देने की इच्छा जताई। इन मुलाकातों में यह चर्चा भी हुई कि अमेरिका में रह रहे इंदौर के लोग अपने अनुभव, तकनीकी ज्ञान और नेटवर्क का इस्तेमाल शहर के विकास में कैसे कर सकते हैं।

*अब इंदौर के लिए अगला कदम AI हब और AI अवेयरनेस*

अमेरिका की यात्रा से एक बात स्पष्ट हुई है कि AI अब भविष्य की तकनीक भर नहीं है। यह शहरों की गवर्नेंस, शिक्षा, उद्योग, रोजगार, परिवहन और नागरिक जीवन को प्रभावित करने वाली वास्तविकता बन चुका है।इसलिए इंदौर को केवल AI का उपयोग करने वाला शहर नहीं, बल्कि AI को समझने, सिखाने और जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने वाला शहर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

इसके लिए AI हब के साथ-साथ AI Literacy और Awareness पर भी काम जरूरी है। लोगों को इसके लाभ समझाने के साथ-साथ दुरुपयोग और जोखिमों से बचने की ट्रेनिंग भी देनी होगी।

अमेरिका से लौटकर मेरा अनुभव यही है AI को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसे समझकर, नियंत्रित करके और समाज के हित में इस्तेमाल जरूर किया जा सकता है। और इंदौर के पास इस दिशा में आगे बढ़ने की पर्याप्त क्षमता है।

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