चेन्नई, 05 अक्टूबर (वार्ता) मद्रास उच्च न्यायालय ने सोमवार को तमिलनाडु के ईरोड शहर की एक निजी बस संचालिका की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें तमिझगा वेट्री कषगम (टीवीके) सरकार की ‘वेट्री पयनम’ योजना को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गयी थी। इस योजना के तहत महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा दी जाती है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता के अर्जी वापस लेने के आधार पर यह आदेश दिया।मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने गांधी जयंती के अवसर पर दो अक्टूबर को ‘वेट्री पयनम’ योजना की शुरुआत की थी। यह योजना पिछली द्रमुक सरकार के दौरान शुरू की गयी ‘विदियाल पयनम’ योजना का ही विस्तारित रूप है। इससे पूरे तमिलनाडु में प्रतिदिन 12,695 साधारण, एलएसएस और एक्सप्रेस बसों में अतिरिक्त 84.32 लाख महिलाओं को लाभ मिल रहा है।
यह याचिका निजी बस संचालिका एन कलामणि ने दाखिल की थी। उनका तर्क था कि इस योजना से निजी बस संचालकों को भारी वित्तीय नुकसान होगा और वे अपना कारोबार बंद करने पर मजबूर हो जायेंगे। उन्होंने यह भी दलील दी कि महिलाओं को बिना किराया दिये यात्रा करने की अनुमति देना समानता के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में कहा कि सरकार ने इस योजना पर सालाना लगभग 6,000 करोड़ रुपये का खर्च आने की बात कही है, लेकिन निजी बस संचालकों को भी ऐसा ही मुआवजा देने और इस योजना में निजी बसों को शामिल करने की उनकी मांग को खारिज कर दिया है।
याचिका में यह दलील भी दी गयी है कि यह योजना विधानसभा में नियम 110 के तहत मुख्यमंत्री की घोषणा के आधार पर लागू की जा रही है और इस संबंध में कोई सरकारी आदेश जारी नहीं किया गया है। याचिका में योजना को असंवैधानिक घोषित करने और मामले के निपटारे तक इसके क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गयी थी।
उन्होंने कहा कि ‘फेडरेशन ऑफ बस ऑपरेटर्स एसोसिएशंस ऑफ तमिलनाडु’ का मुख्यमंत्री से निजी बस संचालकों तक योजना का विस्तार करने का अनुरोध भी बेनतीजा रहा। उनका कहना था कि केवल सरकारी बसों में ही इस योजना को लागू करने से निजी बस संचालकों को बड़ा नुकसान होगा और वे अपना कारोबार समेटने को विवश होंगे।
जब यह मामला मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की प्रथम पीठ के समक्ष आया, तो राज्य सरकार ने दलील दी कि मुख्यमंत्री की विधानसभा में की गयी घोषणा के आधार पर ही इस योजना की शुरुआत की गयी है।
पीठ ने सवाल उठाया कि ईरोड में महज दो रूटों पर बसें चलाने वाली एक निजी बस संचालक पूरी तमिलनाडु में लागू की जा रही योजना को चुनौती कैसे दे सकती है। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि पूरी योजना को चुनौती देने वाली याचिका को जनहित याचिका (पीआईएल) नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही न्यायालय ने याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी विकल्पों को अपनाने की छूट दी।

