भोपाल। मध्य प्रदेश के छह बड़े शहरों—भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, सतना, सिंगरौली और रीवा—में नगर निगमों के बजट और विकास कार्यों को लेकर सवाल सामने आए हैं। कई शहरों में बजट लगातार बढ़ा, लेकिन सड़क, पानी, सीवर, आवास और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कुछ काम समय पर पूरे नहीं हो सके।
भोपाल: बजट बढ़ा, PM आवास का लक्ष्य बाकी
भोपाल नगर निगम का बजट 2023-24 में 3,306.85 करोड़ रुपये था, जो 2026-27 में बढ़कर 3,938.45 करोड़ रुपये हो गया। यानी तीन साल में बजट में करीब 632 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई।
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 11,457 मकानों का लक्ष्य बताया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब 6,573 मकान पूरे हुए हैं। इस हिसाब से करीब 4,884 मकान बाकी हैं। शहर में जलभराव, सड़क, स्ट्रीट लाइट, सीवर और आवास जैसे मुद्दे भी सामने आते रहे हैं।
इंदौर: बजट और वास्तविक आय में बड़ा अंतर
इंदौर में पिछले चार वर्षों में करीब 32 हजार करोड़ रुपये के बजट पेश किए गए। वहीं निगम की कर और अन्य मदों से वास्तविक आय करीब 3,200 करोड़ रुपये रही। सरकारी फंड को जोड़ने के बावजूद बजट और वास्तविक संसाधनों के बीच अंतर बना हुआ है।
शहर में शामिल 29 गांवों और बड़ी संख्या में अवैध कॉलोनियों में सड़क, पानी और ड्रेनेज जैसी सुविधाएं चुनौती बनी हुई हैं।
ग्वालियर: बजट प्रावधान और प्राथमिकताओं पर सवाल
ग्वालियर में कई वर्षों से कुछ कामों के लिए बजट प्रावधान किए गए। वहीं कुछ कामों और मदों में बदलाव को लेकर सवाल उठे हैं। इससे विकास कार्यों की प्राथमिकता और बजट के इस्तेमाल को लेकर चर्चा है।
सतना: ₹400 करोड़ का सालाना बजट
सतना नगर निगम का सालाना बजट करीब 400 करोड़ रुपये है। जानकारी के मुताबिक इसका लगभग आधा हिस्सा स्थापना और अन्य खर्चों में जाता है। AMRUT की जल योजना और प्रधानमंत्री आवास से जुड़े कामों पर राशि खर्च होने के बावजूद कुछ कार्यों की पूर्णता को लेकर सवाल बने हुए हैं।
सिंगरौली: ₹397 करोड़ के काम, फिर भी कई परियोजनाएं अधूरी
सिंगरौली में AMRUT नल-जल, सीवर लाइन और प्रधानमंत्री आवास से जुड़े कार्यों पर करीब 397 करोड़ रुपये खर्च होने की जानकारी है। इसके बावजूद AMRUT और सीवरेज के कुछ काम अधूरे हैं।
करीब 57 करोड़ रुपये का सिविक सेंटर और 9.53 करोड़ रुपये की मॉडल रोड भी तय समय पर आगे नहीं बढ़ सकी।
रीवा: करोड़ों खर्च, 42 काम लंबित
रीवा में AMRUT जल योजना की लागत 151 करोड़ रुपये बताई गई है, जिसमें करीब 120 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। वहीं सीवर सिस्टम की लागत 215 करोड़ रुपये है और इसमें करीब 178 करोड़ रुपये खर्च होने की जानकारी है।
इसके बावजूद कायाकल्प के 42 काम लंबित बताए गए हैं। इसके अलावा कचरे से कंपोस्ट/बिजली बनाने की परियोजना और संजीवनी क्लीनिक से जुड़े कामों की प्रगति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं बताई गई है।
सवाल सिर्फ बजट का नहीं, काम पूरा होने का भी
इन आंकड़ों से एक बड़ा सवाल सामने आता है कि नगर निगमों का बजट कितना बढ़ा, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उस बजट से जमीन पर कितना काम हुआ।
जरूरत इस बात की है कि हर वार्ड में बजट, खर्च और काम की स्थिति सार्वजनिक हो। बड़े प्रोजेक्ट की शुरुआत और पूरा होने की समयसीमा तय हो और सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि काम की वास्तविक प्रगति की भी नियमित निगरानी हो।
क्योंकि शहरों का विकास सिर्फ बजट की किताब में नहीं, बल्कि सड़क, पानी, सीवर, आवास और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के जमीन पर दिखाई देने से तय होता है।
