नयी दिल्ली, 30 सितंबर (वार्ता) उच्चतम अदालत में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए बनी समिति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय के 23 सितंबर के विभाजित फैसले और साझा आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए एक क्यूरेटिव याचिका दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मामले की सुनवाई करने वाले दो न्यायाधीशों में से एक न्यायामूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ‘हितों के टकराव’ की स्थिति में थे।
याचिकाकर्ता जया ठाकुर की ओर से दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि न्यायमूर्ति शर्मा को इस बात का खुलासा करना चाहिए था कि उनके पुत्र, अधिवक्ता सिद्धार्थ शर्मा, जुलाई 2024 से मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनाव आयोग के स्थायी वकील के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। याचिका में 23 सितंबर के आदेश को निरस्त कर मामले की नए सिरे से किसी अन्य उपयुक्त पीठ के सामने सुनवाई की मांग की गई है।
क्यूरेटिव याचिका में कहा गया है कि भले ही मामले का फैसला गुण-दोष के आधार पर किया गया हो, लेकिन श्री सिद्धार्थ शर्मा की चुनाव आयोग के वकील के रूप में नियुक्ति पक्षपात का एक वाजिब पूर्वाग्रह पैदा करती है और यह न्यायिक मर्यादा का सवाल उठाती है। याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें 25 सितंबर को मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से ही श्री सिद्धार्थ शर्मा के निर्वाचन आयोग से जुड़ाव की जानकारी मिली। याचिका में कहा गया है कि न्याय प्रशासन में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए सुनवाई शुरू होने से पहले ही इस तथ्य का प्रकटीकरण आवश्यक था।
उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक ‘रूपा अशोक हुर्रा’ मामले के फैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि विचाराधीन मामले में किसी पक्षकार से जुड़ाव का खुलासा न करना क्यूरेटिव अधिकार क्षेत्र का लाभ उठाने का एक मजबूत आधार बनता है।
याचिका को अंतिम रूप देने और विचार योग्य प्रमाणित करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने स्पष्ट किया कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि न्यायमूर्ति शर्मा ने मामले का फैसला गुण-दोष के आधार पर किया था। हालांकि, उन्होंने कहा कि “न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए” के सिद्धांत को लागू करते हुए न्यायमूर्ति का मामले से खुद को अलग कर लेना अधिक उचित होता। याचिका में पहले समीक्षा याचिका दायर करने से छूट मांगी गई है, क्योंकि ऐसी समीक्षा याचिका सामान्य तौर उसी पीठ के समक्ष जाती।
उल्लेखनीय है कि 23 सितंबर को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजने की केंद्र की अर्जी पर अलग-अलग राय दी थी।
न्यायमूर्ति दत्ता ने केंद्र के अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह विवाद स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ा है, जबकि न्यायमूर्ति शर्मा ने मामले को संविधान पीठ में सुने जाने के पक्ष में राय दी थी। मतभिन्नता के बावजूद दोनों न्यायाधीशों ने एक साझा आदेश पारित करते हुए मामले को एक उपयुक्त पीठ के गठन के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष भेजने का निर्देश दिया था।
