
नई दिल्ली, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का तीन सीटों पर परचम लहराना और उपाध्यक्ष पद पर एक निर्दलीय उम्मीदवार की ऐतिहासिक जीत देश की युवा राजनीति के एक नए अध्याय का संकेत माना जा रहा है. दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव परिणाम को अक्सर बहुस्तरीय राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जाता रहा है.
वैसे भी चुनाव परिणामों के तत्काल बाद भाजपा और उसके शीर्ष नेताओं द्वारा अपनी खुशी जाहिर करते हुए सोशल मीडिया पर जेन जी के प्रधानमंत्री मोदी के साथ नैरेटिव के जरिए यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि देश के युवाओं ने प्रधानमंत्री की नीतियों और राष्ट्रवाद पर पूरी तरह मुहर लगा दी है. क्योंकि विपक्ष द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर खड़े किए गए बेरोजगारी या पेपर लीक जैसे तीखे मुद्दों का जादुई असर लगभग एक लाख बच्चों के बीच हुए चुनाव में नहीं दिखा. लेकिन भाजपा के इस व्यापक दावे की वास्तविक सीमा को उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी दीपांशु शौकीन की तीस हजार से ज्यादा वोटों से हुई एकतरफा जीत ने सवालों के घेरे में लाकर रख दिया है.
एनएसयूआई से बगावत कर नंगे पैर चुनाव लड़ने वाले दीपांशु ने एबीवीपी के आधिकारिक और मजबूत प्रत्याशी को करारी शिकस्त दी. ऐसे में यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से यह संदेश देता है कि आज की जेन जी किसी एक राजनीतिक ब्रांड के गिरफ्त में नहीं है. क्योंकि जहाँ भी छात्रों को किसी उम्मीदवार का व्यक्तिगत संघर्ष, जमीन से जुड़ाव और स्थानीय सरोकार नजर आए, वहाँ उन्होंने स्थापित सत्ताधारी दल और मुख्य विपक्षी दल एनएसयूआई दोनों की प्राथमिकताओं को पीछे छोड़ दिया. इतना ही नहीं एनएसयूआई का सूपड़ा साफ होना और एक बागी निर्दलीय का मुख्यधारा के संगठनों के बीच भारी बहुमत से जगह बनाना यह साबित करता है कि आज के युवाओं की राजनीति बेहद व्यावहारिक और उम्मीदवार केन्द्रित हो चुकी है. हालांकि डीयू के इस परिणाम में जिस तरह से ज्यादातर कालेजों में स्वतंत्र उम्मीदवार को वोट मिला और विजयी उम्मीदवारों से ज्यादा बिखरे विपक्ष को मिला है वह साफ संदेश दे दिया है कि जेन जी का एक समूह अभी भी अपने स्वतंत्र सोच के साथ आगे बढ़ना चाहता है.
