
जबलपुर। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि कंस्ट्रक्टिव नॉलेज के आधार पर सजा देना, बिना किसी सबूत के निष्कर्ष निकालने जैसा है। एकलपीठ ने अपीलीय अथॉरिटी के आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को दी गयी सजा निरस्त कर दी।
बुरहानपुर फॉरेस्ट डिवीजन में फॉरेस्ट गार्ड के पद पर पदस्थ सत्यनारायण सोनी की तरफ से दायर याचिका में अपीलीय प्राधिकरण चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट खंडवा द्वारा 21 सितम्बर 2006 को सजा से संबंध में जारी आदेश को चुनौती दी गयी थी। आदेश में उसे नौकरी से हटाए जाने की सजा को पांच साल तक न्यूनतम वेतन प्रदान करने में तब्दील कर दिया गया था। याचिका में कहा गया था कि वह 23 सितम्बर 1994 से 30 दिसम्बर 2002 तक बोरी बीट, असीर रेंज में फॉरेस्ट गार्ड के रूप में तैनात था। उसे 30 दिसम्बर 2002 को सस्पेंड कर दिया गया था और 10 फरवरी 2003 को चार्जशीट जारी की गई थी।
चार्जशीट में आरोप थे कि उसके कार्यकाल में 1047 हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण हुआ था। इसके अलावा बोरी गाँव में सरकारी नियंत्रण वाले वन उत्पाद (सलाई गोंद या गम) को अवैध रूप से इकट्ठा और जमा किया गया था। जिसकी सूचना उसने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को नहीं दी। इसके अलावा अतिक्रमण रोकने तथा अवैध सामान जब्त करते हुए मामला दर्ज नहीं किया।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अनुशासनात्मक अथॉरिटी के निष्कर्ष बिना किसी सबूत और अहम दस्तावेजों को नजरअंदाज कर जारी किया गया है तो वह तर्कहीन, मनमाना और कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं माने जाते हैं ।
