यमुना खादर को नुकसान पहुंचाने के लिए आर्ट ऑफ लिविंग को जिम्मेदार ठहराने वाला एनजीटी का आदेश रद्द, पांच करोड़ रुपये लौटाने का निर्देश

नई दिल्ली, 22 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने शनिवार को राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के 2017 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें 2016 के ‘विश्व संस्कृति महोत्सव’ के दौरान यमुना के मैदानी इलाकों (खादर) को नुकसान पहुंचाने के लिए आर्ट ऑफ लिविंग (एओएल) को जिम्मेदार ठहराया गया था।

उच्चतम न्यायालय ने इसके साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को आदेश दिया कि वह एओएल से पर्यावरण मुआवजे के रूप में जमा कराये गये पांच करोड़ रुपये वापस करे।

न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवि शंकर की ओर से स्थापित आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन से जुड़ी भारतीय संस्था ‘व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया’ (वीवीकेआई) की अपील को स्वीकार कर लिया।

यह पांच करोड़ रुपये की राशि मार्च 2016 में एनजीटी के पारित एक अंतरिम आदेश के तहत जमा की गयी थी। यह आदेश 11-13 मार्च तक दिल्ली में यमुना खादर पर आयोजित तीन दिवसीय ‘विश्व संस्कृति महोत्सव’ से ठीक पहले जारी किया गया था।

कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति देते हुए एनजीटी ने संस्था को पर्यावरण मुआवजे के तौर पर पांच करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया था। यह तय किया गया था कि खादर को पहुंचाये गये कथित नुकसान का आकलन करने के बाद अंतिम रूप से तय होने वाले मुआवजे में इस राशि को समायोजित किया जायेगा।

सड़कों, रैंप और अन्य ढांचों के निर्माण के साथ-साथ यमुना खादर के प्राकृतिक स्वरूप और इसके बहाव पर पड़े कथित असर को लेकर इस महोत्सव से पर्यावरणीय चिंताएं पैदा हुई थीं।

दिसंबर 2017 के अपने अंतिम फैसले में एनजीटी ने एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन को खादर को पहुंचाये गये नुकसान का जिम्मेदार ठहराया था।

एनजीटी ने संस्था पर कोई अतिरिक्त मुआवजा नहीं लगाया, लेकिन उसने निर्देश दिया कि प्रभावित खादर के पुनरुद्धार के लिए पहले से जमा कराये गये पांच करोड़ रुपये का इस्तेमाल डीडीए करे।

एनजीटी ने कार्यक्रम की अनुमति देने में हुई कमियों को लेकर डीडीए और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) को भी कसूरवार माना था और उन पर अलग-अलग जुर्माना लगाया था।

एनजीटी के इन निष्कर्षों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देते हुए फाउंडेशन ने तर्क दिया कि उस जगह को कभी खादर के रूप में सीमांकित ही नहीं किया गया था। इसके अलावा ऐसा कोई वैज्ञानिक आकलन भी नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि पर्यावरण को कितना नुकसान इस महोत्सव के कारण हुआ था।

फाउंडेशन ने यह सवाल भी उठाया कि जब कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति खुद डीडीए ने दी थी, तो फिर इसके लिए संस्था को जिम्मेदार ठहराना कहां तक उचित है।

 

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