
बालाघाट, मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिला बालाघाट में पिछले 2 महीनों में 21 बच्चों की मौत का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। मौतों के पीछे सबसे बड़ी वजह कुपोषण से जुड़ी बीमारियां मानी जा रही हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि मछुरदा, कोरका, मातला, कोंडेकसा, अडोरी और बोंदारी जैसे गांवों में पिछले 6 महीनों से गर्भवती महिलाओं और बच्चों को पोषण आहार का वितरण नहीं हुआ। इसी वजह से बच्चे कुपोषण के साथ मलेरिया, डेंगू, टाइफाइड और तेज बुखार की चपेट में आ गए।
*आंकड़ों को लेकर टकराव*
प्रशासन ने अब तक 8 मौतों की पुष्टि की है, जबकि ग्रामीण 19 से 21 बच्चों की मौत का दावा कर रहे हैं। मछुरदा गांव के सगनू मरकाम का एक बच्चा मर चुका है और 3 अस्पताल में भर्ती हैं। सगनू ने बताया, “5 साल के बच्चे का वजन 10 किलो के आसपास है। बहुत समय से पोषण आहार नहीं मिला, अगर मिल जाता तो एक बच्चा बच जाता।”
*कांग्रेस ने सरकार को घेरा*
इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार शुक्रवार 15 अगस्त को बालाघाट पहुंचे। उन्होंने मछुरदा, अडोरी, बोंदारी, कोरका और कोंडेकसा गांवों का दौरा कर मृत बच्चों के परिजनों से मुलाकात की।
सिंघार ने आरोप लगाया कि “प्रशासन मौत के आंकड़े छिपा रहा है। दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं धरातल तक नहीं पहुंच रही हैं। अगर समय रहते स्वास्थ्य सुविधाओं का बेहतर क्रियान्वयन किया गया होता तो यह मंजर नहीं दिखता।”
बैहर विधायक संजय उइके ने भी कहा कि कई बच्चों की मौत मीजल्स, मलेरिया और अन्य बीमारियों से हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण कुपोषण और टीकाकरण न हो पाना है।
*कलेक्टर ने दी सफाई*
जिला कलेक्टर कुमार सत्यम ने कहा, “जिन 19 मौतों की बात की जा रही है, उन्हें हाल की 8 मौतों से जोड़ना सही नहीं है। इनमें कुछ पुराने मामले भी शामिल हैं।”
नक्सल प्रभावित इन बैगा और गोंड बहुल गांवों में कुपोषण पहले से बड़ी समस्या है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक पोषण आहार और स्वास्थ्य सेवाएं नियमित नहीं होंगी, मासूमों की जान इसी तरह जाती रहेगी।
