तो क्या गांजा तस्करी का सी एण्ड एफ बन चुका है सतना..?

सतना : सी एण्ड एफ यानी कैरिंग एण्ड फारवर्डिंग शब्द का प्रयोग वैसे तो घरेलू व्यापार और वितरण व्यवस्था के लिए किया जाता है. लेकिन पिछले दिनों कानपुर में गांजे की बड़ी खेप के साथ पकड़े गए आरोपियों ने जो खुलासा किया है, उससे सतना जिले की कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत मिल रहे हैं. आरोपियों के अनुसार उड़ीसा से गांजे की खेप पहले सतना पहुंचती है और उसके बाद चित्रकूट होते हुए उप्र के तस्करों तक पहुंच जाती है. तो क्या यह माना जाए कि जिले के कुछ तस्करों द्वारा उड़ीसा से गांजे की खेप मंगाकर गुप्त तरीके से गादामों में छिपाकर रखने के बाद आगे के कथित डीलर्स, दुकानदार अथवा ग्राहकों तक पहुंचाने का काम किया जा रहा है.

पिछले दिनों कानुपर पुलिस ने कार सवार दो आरोपियों को गिरफ्तार करते हुए उनके पास से 219 किलो गांजे की खेप पकड़ी थी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में पकड़े गए आरोपियों शिवम सिंह और रोहित उर्फ लटकन ने उन्हें गांजे की खेप अरुण कुमार उर्फ महाराज नामक व्यक्ति से मिलती थी. अरुण द्वारा गांजे की खेप सतना से चित्रकूट पहुंचाई जाती थी. आरोपियों के अनुसार सतना वाला सप्लायर गांजे की खेप उड़ीसा से मंगवाता है. यह जानकारी सामने आने पर कानपुर पुलिस द्वारा उड़ीसा से कानपुर और चित्रकूट की ओर आने वाले रास्तों पर निगरानी सख्त कर दी गई है. लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस चौंकाने वाले खुलासे के बावजूद न तो जिले की पुलिसिंग व्यवस्था में किसी तरह की कसावट देखने को मिल रही है, और न ही पुलिस महानिरीक्षक रीवा जोन द्वारा मादक पदार्थों के विरुद्ध छेड़े गए ऑपरेशन प्रहार को लेकर अब तक कोई विशेष उपलब्धि ही हासिल हो पाई है.

कानपुर में पकड़े गए आरोपियों के खुलासे की तस्दीक महज 2 महीने पहले के घटनाक्रम के जरिए भी की जा सकती है. शहर के डिलौरा बाइपास टिकुरिया टोला क्षेत्र में मौजूद एक गोदाम में गांजा और नशे में इस्तेमाल होने वाली कफ सीरप की बड़ी खेप छिपाकर रखी गई थी. वह खेप कितने दिनों से रखी हुई थी और उक्त गोदाम से नशे की सप्लाई कहां-कहां की जा रही थी, सतना पुलिस इससे पूरी तरह अनजान बनी हुई थी. मामला तब खुला जब स्पेशल टास्क फोर्स भोपाल की टीम ने सतना में दबिश दी. उक्त गोदाम में छापेमारी करते हुए 260 किलो गांजा और नशीली कफ सीरप की 7 हजार 200 शीशियां बरामद की गई थीं. नशे की खेप की इतनी बड़ी बरामदगी सतना पुलिस की आगे की जांच और कार्रवाई के लिहाज से बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकती थी. लेकिन इसे एसटीएफ भोपाल का मामला बताते हुए पल्ला झाड़ लिया गया. उक्त घटना से पहले दिसंबर 2025 में आरोपियों के साथ पकड़ी गई गांजे की खेप को भी तस्करी की तकरीबन वैसी ही कहानी को उजागर करती नजर आती है. पके ड़ी गई गांजे लिहाजा इस बात का अंदाजा लगाना अधिक मुश्किल नहीं है कि शहर सहित जिले भर में किसी तरह से गांजा और मेडिकल नशे की तस्करी का जाल फैला हुआ है.

अंतरराज्यीय-स्थानीय गिरोह सक्रिय
पुलिस से जुड़े सुत्रों का मानना है कि जिले में गांजा और मेडिकल नशे की तस्करी के पीछे कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि अलग अलग अंतरराज्यीय गिरोह सक्रिय हैं. इन दिनों सबसे अधिक चर्चित नेटवर्क शैलेंद्र उर्फ शिब्बू और अनिल से जुड़े गिरोह का बताया जा रहा है. इसी कड़ी में पंकज सिंह के नेटवर्क को भी शामिल किया जा सकता है. जबकि सतना सहित विंध्य में गांजा तस्करी के मामले में सबसे बड़ा नाम अब भी अनूप जायसवाल उर्फ जस्सा के गिरोह के तौर पर लिया जाता है. इन सभी गिरोह द्वारा उड़ीसा-छत्तीसगढ़ के रास्ते नशे की खेप मंगाने के बाद आगे की सप्लाई कर दी जाती है. वैसे कहने के लिए अधिकांश तस्कर सरगना सलाखों के पीछे हैं, लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि उनका नेटवर्क कितना सक्रिय है. जबकि पुलिस गाहे-बगाहे कुछ स्थानीय पेडलरों को पकडक़र अपनी पीठ थपथपा लिया करती है.

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