धनंजय श्रीवास्तव
जबलपुर: रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का भारी-भरकम सामान उठाकर उन्हें ट्रेन तक पहुंचाने वाले कुलियों यानी पोर्टरों की भूमिका भले ही रेलवे व्यवस्था में वर्षों से बनी हुई है, लेकिन उनके दर्जे को लेकर अब एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। जबलपुर रेलवे स्टेशन पर काम कर रहे कुलियों की मांग है कि उन्हें रेलवे में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के पदों पर शामिल किया जाए। उनका कहना है कि वे लंबे समय से रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को सेवा दे रहे हैं, रेलवे की व्यवस्था का हिस्सा बनकर काम कर रहे हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारी का दर्जा उन्हें नहीं मिल सका है। जबलपुर स्टेशन पर वर्तमान में करीब 98 कुली कार्यरत बताए जा रहे हैं। कुलियों का कहना है कि जिस तरह वे प्रतिदिन यात्रियों के बीच रेलवे की सेवा करते हैं, उसी तरह उनके भविष्य और रोजगार की सुरक्षा को लेकर भी रेलवे को गंभीरता से विचार करना चाहिए। इधर रेलवे का कहना है कि चतुर्थ श्रेणी स्तर की सीधी भर्ती व्यवस्था अब पहले जैसी नहीं रही है। हालांकि कुलियों की मांग और प्रस्ताव को उचित माध्यम से रेलवे बोर्ड तक पहुंचाया जाएगा।
परिवार जन भी हो शामिल
कुली राम का कहना है कि उन्हें रेलवे की ओर से ड्रेस तो उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं को लेकर अभी भी कई कमियां हैं। उनका कहना है कि स्वास्थ्य कार्ड बनाने की प्रक्रिया अब तक पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हो सकी है और जिन कार्डों की मांग की जाती रही है, उनमें परिवार के सदस्यों को भी शामिल किए जाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। कुलियों का तर्क है कि यदि वे लगातार स्टेशन पर काम करते हैं और उनकी आय इसी काम पर निर्भर है तो उनके परिवार को भी स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ मिलना चाहिए। दूसरी ओर रेलवे का कहना है कि पोर्टरों के लिए समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं और उपलब्ध नियमों के अनुसार स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। रेलवे के अनुसार पोर्टर रेलवे के नियमित कर्मचारी नहीं, बल्कि लाइसेंस प्राप्त/आउटसोर्स व्यवस्था के तहत काम करने वाले कर्मी हैं और उन्हें उनके लिए निर्धारित सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यानी कुलियों की नजर में सवाल सुविधा से ज्यादा सुरक्षा का है, जबकि रेलवे की नजर में व्यवस्था नियमों के मुताबिक चल रही है।
नियम में हो चुका है बदलाव
दिलचस्प बात यह है कि कुलियों को रेलवे में शामिल करने की मांग कोई नई मांग नहीं है। वर्ष 2008 में रेलवे बोर्ड ने बाकायदा लाईसेंस्ड पॉर्टर्स को गैंगमैन के पद पर नियुक्त करने के लिए विशेष व्यवस्था की थी। रेलवे बोर्ड के 1 अप्रैल 2008 के आदेश के तहत उस समय के पात्र लाईसेंस्ड पॉर्टर्स को एक वन टाइम मेजर के रूप में गैंगमैन पद पर नियुक्त करने का प्रावधान किया गया था। इसमें 26 फरवरी 2008 को वैध लाइसेंस रखने वाले पोर्टर, 18 से 50 वर्ष की आयु वाले व्यक्ति, मेडिकल रूप से फिट उम्मीदवार तथा रीड़ एंड राईट की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता जैसी शर्तें रखी गई थीं। नियुक्ति के लिए लाइसेंस और बैज सरेंडर करने तथा पोर्टर के रूप में अधिकार छोड़ने की शर्त भी थी। यानी उस समय रेलवे बोर्ड ने कुलियों के लिए रेलवे की नियमित सेवा में आने का रास्ता एक विशेष परिस्थिति में खोला था।
था आदेश का हिस्सा
25 सितंबर 2009 के रेलवे बोर्ड के आदेश RBE No. 178/2009 में भी 2008 की इसी व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख किया गया। इसमें कहा गया कि पात्र लायसेंस्ड पॉर्टर्स को गैंगमैन के रूप में शामिल करने की व्यवस्था थी। बाद में कुछ ऐसे पोर्टरों के संबंध में भी व्यवस्था की गई जिन्होंने गैंगमैन के रूप में नियुक्ति पा ली थी या स्क्रीनिंग पूरी कर ली थी, लेकिन वापस लाईसेंस्ड पॉर्टर के रूप में काम करना चाहते थे। जरूरत होने पर उन्हें उसी स्टेशन पर वापस पोर्टर के रूप में आने की अनुमति देने की व्यवस्था भी की गई थी।
बोर्ड तक पहुंचाया जाएगा प्रस्ताव
अब जबलपुर के कुलियों की निगाहें रेलवे बोर्ड तक उठने वाले प्रस्ताव पर हैं। कुलियों का कहना है कि वे चाहते हैं कि उनकी मांग को सिर्फ स्टेशन स्तर की मांग मानकर न छोड़ दिया जाए, बल्कि इसे रेलवे बोर्ड के सामने गंभीरता से रखा जाए। उनका कहना है कि यदि चतुर्थ श्रेणी में सीधी भर्ती का प्रावधान वर्तमान व्यवस्था में बंद हो चुका है तो उनके लिए कोई वैकल्पिक नीति या विशेष व्यवस्था बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। इधर रेलवे का कहना है कि कुलियों को रेलवे का नियमित कर्मचारी मानना मौजूदा भर्ती नियमों के तहत संभव नहीं है, लेकिन उनकी मांग और प्रस्ताव को बोर्ड तक पहुंचाया जाएगा।
