
दमोह। वीर शासन जयंती व चातुर्मास वर्षायोग के पावन अवसर पर आयोजित विशाल धर्मसभा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर महाराज ने कहा कि तीर्थंकर भगवानों का महत्व केवल उनके मोक्ष प्राप्त करने में नहीं, बल्कि अनगिनत जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने में है। संसार में अनंत जीव मोक्ष को प्राप्त हुए हैं और होते रहेंगे, किंतु प्रत्येक चौथे काल में केवल 24 तीर्थंकर ही होते हैं, जिनके माध्यम से धर्मशासन का प्रवर्तन होता है। प्रथम शासननायक भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) और अंतिम शासननायक भगवान महावीर स्वामी हैं। भगवान महावीर का प्रथम दिव्य उपदेश श्रावण वदी प्रतिपदा को हुआ और उसी दिन से वीर शासन का शुभारंभ माना जाता है। इसी ऐतिहासिक अवसर की स्मृति में जैन समाज प्रतिवर्ष वीर शासन जयंती मनाता है।
मुनि श्री ने कहा कि धर्म किसी बाहरी आडंबर का नाम नहीं, बल्कि आत्मा के विशुद्ध परिणामों का नाम है। धर्म का वास्तविक स्वरूप सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र में निहित है। सम्यक दर्शन का अर्थ है देव, शास्त्र और गुरु सहित सातों तत्त्वों के वास्तविक स्वरूप में अटूट श्रद्धा रखना। यदि तत्त्व सत्य हों, पर श्रद्धा यथार्थ न हो, तो सम्यक्त्व की प्राप्ति संभव नहीं होती। इसलिए जीवन में सही श्रद्धा, सही ज्ञान और सही आचरण का समन्वय आवश्यक है।
उन्होंने सम्यक ज्ञान की व्याख्या करते हुए कहा कि संसार में अनेक प्रकार की जानकारियाँ उपलब्ध हैं। वैज्ञानिक, चिकित्सक और अभियंता अपने-अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ हो सकते हैं, किंतु केवल भौतिक पदार्थों का ज्ञान सम्यक ज्ञान नहीं कहलाता। सम्यक ज्ञान वह है, जो आत्मा और परमार्थ का बोध कराए। उन्होंने कहा, “जड़ का ज्ञान बहुत लोगों के पास है, लेकिन जीवन का ज्ञान दुर्लभ है। यदि मनुष्य स्वयं को ही नहीं जान पाया, तो संसार की सारी जानकारियाँ भी अधूरी हैं।”
मुनि श्री ने कहा कि चातुर्मास केवल संतों के एक स्थान पर रुकने का समय नहीं, बल्कि समाज के आध्यात्मिक जागरण का महापर्व है। देशभर में जहाँ-जहाँ पिच्छीधारी दिगंबर मुनि वर्षायोग स्थापित करते हैं, वहाँ धर्म, स्वाध्याय, संयम और संस्कार का वातावरण निर्मित हो जाता है। संतों के आगमन से समाज की आध्यात्मिक उदासी समाप्त होती है और जन-जन में आत्मकल्याण की प्रेरणा जागृत होती है।
उन्होंने कहा कि जैन समाज कैलेंडर में अंकित पर्व-तिथियों को तो श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाता ही है, किंतु जहाँ दिगंबर पिच्छीधारी संतों का प्रवास होता है, वहाँ प्रत्येक दिन पर्व और उत्सव बन जाता है। दिगंबर मुनि चलते-फिरते तीर्थ हैं। उनके विचार, व्यवहार, स्वाध्याय, तप और संयम समाज को धर्ममय बना देते हैं तथा निराश व्यक्ति के जीवन में भी नई ऊर्जा का संचार कर देते हैं।
मराठी की प्रसिद्ध उक्ति “संत साधू एती घरा, तोची दिवाली दशहरा” का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि कैलेंडर में दशहरा और दीपावली अलग-अलग तिथियों पर आते हैं, किंतु जिस ग्राम या नगर में संतों का चातुर्मास होता है, वहाँ प्रतिदिन दीपावली और दशहरे जैसा आनंद अनुभव होता है। संतों की वाणी, उनका त्याग और उनका जीवन ही समाज के लिए सबसे बड़ा उत्सव बन जाता है।
उन्होंने वर्षायोग की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि वर्षा ऋतु का जल जिस प्रकार धरती को तृप्त करता है, उसी प्रकार चातुर्मास में गुरुओं की अमृतमयी वाणी मानव के अंतर्मन को भिगो देती है। जब हृदय श्रद्धा और भक्ति से भीगता है, तब जीवन का दृष्टिकोण बदल जाता है और मनुष्य का अंतःकरण निर्मल बनने लगता है।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से बड़े बाबा के चरणों में निष्कपट श्रद्धा और समर्पण के साथ जुड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि भगवान की भक्ति जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने की शक्ति रखती है। मनुष्य भले ही सांसारिक दृष्टि से खाली हाथ आए, किंतु यदि उसका हृदय श्रद्धा, भक्ति और समर्पण से भरा है, तो वह आध्यात्मिक संपदा से परिपूर्ण होकर लौटता है। बड़े बाबा के दरबार में किया गया समर्पण कभी व्यर्थ नहीं जाता; वहाँ से मिलने वाली आध्यात्मिक समृद्धि पूरे जीवन को आनंद, शांति और संतोष से भर देती है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्र कमेटी के प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर मुनि श्री के प्रेरणादायी उद्बोधन का श्रवण किया तथा आत्मशुद्धि, स्वाध्याय, संयम और धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लिया।
