शिवसेना विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई , सिब्बल ने शिंदे गुट को असली शिवसेना मानने पर उठाया सवाल

नयी दिल्ली/मुंबई, 30 जुलाई (वार्ता) उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बीच लंबे समय से चल रहे चुनाव चिह्न विवाद पर गुरुवार को उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई। यह मामला उद्धव नीत पार्टी के छह बागी सांसदों के हालिया दलबदल की वैधता भी तय करेगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने स्पष्ट किया कि वह एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हुए विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के मुद्दे पर अपनी दलीलें पेश करना चाहते हैं। श्री सिब्बल ने न्यायालय के सामने मूल अविभाजित शिवसेना के इतिहास और वर्ष 2022 की बगावत के पूरे घटनाक्रम को विस्तार से रखा। उन्होंने बताया कि किस तरह श्री उद्धव ठाकरे उस शिवसेना के प्रमुख हैं, जिसकी स्थापना उनके पिता श्री बालासाहब ठाकरे ने वर्ष 1966 में की थी। श्री ठाकरे का पक्ष रखते हुए श्री सिब्बल ने पीठ को बताया कि श्री एकनाथ शिंदे को वर्ष 2018 में स्वयं श्री ठाकरे ने पार्टी का नेता नियुक्त किया था। इसके बाद शिवसेना के 31 विधायकों ने बगावत की और पहले सूरत तथा बाद में गुवाहाटी चले गए, जहाँ आठ और विधायक उनके साथ मिल गए। इस तरह बागी विधायकों की संख्या 39 हो गई। श्री सिब्बल ने कहा कि इसके बाद बागी विधायकों ने राज्यपाल के पास जाकर सरकार बना ली। उन्होंने तर्क दिया, “किसी एक पार्टी के चिह्न पर चुनाव जीतना, फिर बगावत करके दूसरी पार्टी में शामिल हो जाना और बाद में खुद ही मूल पार्टी होने का दावा करना—यह प्रतिनिधि लोकतंत्र पर एक बहुत बड़ा हमला है।” श्री सिब्बल ने ‘सुभाष देसाई’ मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का उदाहरण देते हुए कहा, “राजनीतिक दल और विधायी दल दो अलग-अलग इकाइयाँ होते हैं। इसलिए केवल विधायकों की संख्या ज्यादा होने के आधार पर किसी विधायी दल को मूल राजनीतिक दल नहीं माना जा सकता। 
चुनाव आयोग का निर्णय पूरी तरह गलत है।”

श्री सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग ने केवल विधायकों की संख्या बल के आधार पर मूल शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न (धनुष-बाण) एकनाथ शिंदे गुट को सौंप दिया। इसके कारण श्री ठाकरे के नेतृत्व वाली मूल शिवसेना को अपना ही चुनाव चिह्न गंवाना पड़ा। श्री सिब्बल ने कहा, “यदि किसी व्यक्ति के आचरण और परिस्थितियों से यह स्पष्ट होता है कि उसने अपनी इच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ दी है, तो वह अयोग्यता के दायरे में आता है। इस मामले की परिस्थितियाँ यही साबित करती हैं, जो मैं न्यायालय के सामने रखूँगा।” अधिवक्ता ने कहा, “10, 13 या 15 सदस्यों का विधायी समूह यूँ ही आसानी से एक राजनीतिक दल से दूसरे में नहीं जा सकता। यह तो अब लगभग रोज का काम बन गया है। कोई व्यक्ति पार्टी ‘ए’ के चिह्न पर चुनाव जीतता है, पार्टी ‘बी’ में चला जाता है और संसद में पार्टी ‘बी’ के प्रतिनिधि के रूप में बैठता है। इस व्यवस्था को सही ठहराने की कोशिश की जा रही है, जो लोकतंत्र और हमारी राजनीतिक व्यवस्था के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक है।” श्री सिब्बल ने शीर्ष न्यायालय से गुहार लगायी, “न्यायालय को इस मुद्दे पर फैसला करना ही होगा क्योंकि यह हर दिन हो रहा है। यह याचिका वर्ष 2023 में दायर की गयी थी और आज हम वर्ष 2026 में आ पहुँचे हैं। इस बीच नये चुनाव भी हो चुके हैं और वे लोग दोबारा चुनकर आ गये हैं। अगर इस याचिका पर समय पर सुनवाई हो गयी होती, तो शिंदे सरकार बनती ही नहीं।” अधिवक्ता की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे दोनों गुटों को आगे की बहस के लिए जरूरी दस्तावेज जमा करने के आदेश दिये। मामले की अगली सुनवाई अब चार अगस्त को होगी।

शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न का यह मामला सीधे तौर पर इस बात से जुड़ा है कि उद्धव ठाकरे गुट से बगावत करने वाले विधायकों और सांसदों को अयोग्य ठहराया जायेगा या नहीं। गौरतलब है कि जून 2022 में एकनाथ शिंदे और 39 अन्य विधायकों ने श्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी। इसके चलते महा विकास आघाड़ी (एमवीए) की सरकार गिर गयी थी और पार्टी दो हिस्सों में बंट गयी थी। इसके बाद श्री शिंदे ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थन से राज्य में सरकार बनायी थी।
पार्टी में विभाजन के बाद असली शिवसेना और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न का विवाद चुनाव आयोग पहुंचा था। फरवरी 2023 में आयोग ने शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न एकनाथ शिंदे गुट को दे दिया था। वहीं उद्धव ठाकरे गुट को ‘शिवसेना (यूबीटी)’ नाम दिया गया था और ‘मशाल’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था। आयोग के इसी फैसले को चुनौती देते हुए श्री उद्धव ठाकरे ने उच्चतम न्यायालय में विशेष याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि आयोग का फैसला गलत है क्योंकि ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न मूल रूप से अविभाजित शिवसेना का ही था।

Next Post

कर्नाटक में कैबिनेट विस्तार को लेकर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की बैठक

Thu Jul 30 , 2026
नयी दिल्ली, 30 जुलाई (वार्ता) कर्नाटक सरकार के संभावित कैबिनेट विस्तार को लेकर गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के सरकारी आवास 10 राजाजी मार्ग पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की अहम बैठक हुई। करीब तीन घंटे तक चली इस बैठक में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कर्नाटक के […]

You May Like