वाशिंगटन, 28 जुलाई (वार्ता) अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ आर्थिक युद्ध छेड़ने की नीति अब उसकी की रणनीति का सबसे मुख्य हिस्सा बन गयी और वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों का तर्क है कि ईरान पर लगातार वित्तीय एवं आर्थिक दबाव बनाना, सैन्य हवाई हमलों की तुलना में ज्यादा असरदार हथियार साबित हो सकता है तथा इससे ईरान को कुल मिलाकर बहुत बड़ा नुकसान पहुंच सकता है।
यह आकलन ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका ने लगातार 13 दिनों तक किये गये हवाई हमलों के बाद अपने सैन्य अभियानों को अस्थायी रूप से रोक दिया है और अपना पूरा ध्यान कूटनीति तथा आर्थिक दबाव बनाने पर लगा दिया है।
न्यूज मीडिया ‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ईरान की लगातार बिगड़ती आर्थिक हालत वहां के नेतृत्व पर भारी दबाव बना रही है। अधिकारी ने कहा, “ईरानी चाहते हैं कि उन पर बमबारी बंद हो और उन्हें पैसा मिले। लेकिन वास्तव में उनकी प्राथमिकता पैसा ही है, वे सबसे पहले वित्तीय राहत चाहते हैं।”
यह बयान ऐसे समय में आया है जब ओमान, कतर और पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देश दोनों देशों के बीच जारी इस अस्थाई युद्ध विराम को एक स्थायी युद्धविराम में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को दावा किया था कि ईरान ने एक संभावित समझौते के लिए खुद बातचीत की पहल की है, हालांकि ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बघाई ने श्री ट्रंप के इस दावे को पूरी तरह नकार दिया।
इस समय जारी चर्चाओं में एक मुख्य प्रस्ताव यह है कि ईरान और ओमान को ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से गुजरने वाले जहाजों के प्रबंधन में भूमिका दी जाये। इससे ईरान को कमाई भी हो सकती है और व्यापारिक जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य करने में मदद मिलेगी। यह प्रस्ताव मलेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया द्वारा मलक्का और सिंगापुर जलडमरूमध्य को संभालने के लिए बनाये गये आपसी सहयोग के मॉडल पर आधारित है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ईरान चाहता है कि अमेरिका आगे कोई सैन्य कार्रवाई न करने की गारंटी दे, उसकी जब्त की गयी संपत्ति को वापस इस्तेमाल करने दे और प्रतिबंधों में छूट दे। लेकिन श्री ट्रंप तब तक आर्थिक दबाव कम करने के मूड में नहीं हैं जब तक कि ईरान अपने बाकी बचे परमाणु सामग्री को सौंपने जैसी बड़ी शर्तें न मान ले।
अमेरिकी अधिकारियों ने खुफिया जानकारी के हवाले से बताया कि ईरान का आर्थिक संकट बहुत गहराता जा रहा है। एक अधिकारी ने कहा, “खुफिया रिपोर्ट्स से पता चला है कि ईरानी प्रशासन शिकायत कर रहा है कि वे अपने सैनिकों को वेतन तक नहीं दे पा रहे हैं। यह सब अमेरिकी वित्त मंत्रालय द्वारा बनाये गये भारी वित्तीय दबाव का नतीजा है। ईरान में बैंकों के डूबने का खतरा है और इतने बड़े तेल उत्पादक देश में पेट्रोल-डीजल की किल्लत हो गयी है। उन्हें अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से ज्यादा वित्त मंत्रालय का डर सता रहा है।”
अधिकारियों ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी प्रतिनिधियों जेरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ के साथ पिछली मुलाकातों में ईरानी बातचीतकर्ताओं ने बार-बार वित्तीय राहत की गुहार लगायी थी।
ट्रंप प्रशासन ने अपने ‘अधिकतम दबाव अभियान’ के तहत ईरान के तेल निर्यात, शिपिंग नेटवर्क, वित्तीय प्रणाली और हथियार खरीद को निशाना बनाते हुए 1,000 से अधिक लोगों, जहाजों और विमानों पर कड़े प्रतिबंध लगाये हैं।
सैन्य अभियानों में आयी इस रोक के पीछे ‘जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ’ के अध्यक्ष जनरल डैन केन की सलाह भी मानी जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि लगातार हमले जारी रखने से पश्चिमी एशिया में अमेरिकी वायु रक्षा मिसाइलों के स्टॉक पर असर पड़ सकता है। हालांकि, व्हाइट हाउस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी मिसाइलों का स्टॉक खत्म नहीं हुआ है, लेकिन वैश्विक जोखिमों को देखते हुए राष्ट्रपति के सामने सभी पहलुओं को रखा जाता है।
दूसरी तरफ, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सिर्फ आर्थिक प्रतिबंधों के दम पर ईरान को झुकाना आसान नहीं होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने इस साल की पहली छमाही में करीब 23 अरब डॉलर का तेल बेचा है, जो उसके बजट अनुमान से कहीं ज्यादा है। उन्होंने इसे अमेरिकी विदेश नीति की एक नाकाम रणनीति बताया।
इसके बावजूद, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि श्री ट्रंप कूटनीति को मौका देना चाहते हैं, लेकिन सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला है। उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान के लिए यही समझदारी होगी कि वह बातचीत से समझौता कर ले, वरना उसे अंजाम पता है।
