
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल व जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने कैदियों की भोजन व्यवस्था से जुड़े मामले में जेल एवं सुधार सेवाओं के महानिदेशक (डीजी जेल) डॉ. वरुण कपूर द्वारा प्रस्तुत हलफनामें पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हलफनामा न्यायालय को गुमराह करने वाला प्रतीत होता है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि हिरासत में बंद कैदी से कुछ भी कहलवाया जा सकता है, इसलिए केवल उसके बयान के बजाय भोजन के समय, तय मेन्यू और आधिकारिक रिकार्ड प्रस्तुत किए जाने चाहिए। हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि संतोषजनक हलफनामे प्रस्तुत नहीं किए गए तो जेल महानिदेशक और पुलिस महानिदेशक को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ सकता है।
दरअसल, यह मामला दहेज हत्या के प्रकरण में सजा काट रहे रीवा केंद्रीय जेल के बंदी अब्दुल माजिद की अपील से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने बंदी को लाने वाले पुलिस कर्मियों से भोजन व्यवस्था के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि कैदी के भोजन के लिए अलग से कोई राशि नहीं मिलती और वे अपने दैनिक भत्ते से ही भोजन कराते हैं। इसे गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने पहले जेल प्रशासन से जवाब मांगा था। डीजी जेल की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि बंदी को रीवा जेल से रवाना होने से पहले चाय और चार रोटियां दी गई थीं। इस पर कोर्ट ने कहा कि हलफनामा संतोषजनक नहीं है। न्यायालय ने कहा कि जेलों के निरीक्षण के दौरान यह देखा गया है कि सामान्यत: सुबह 11 बजे तक भोजन तैयार नहीं होता। ऐसे में भोजन वितरण का पूरा शेड्यूल, तय मेन्यू और प्रत्येक कैदी के लिए निर्धारित भोजन की मात्रा रिकार्ड सहित प्रस्तुत की जानी चाहिये।
