
ग्वालियर चंबल डायरी हरीश दुबे।दतिया उपचुनाव के लिए नामांकन दाखिली का सिलसिला शुरू हो चुका है। एक ओर भाजपा ने अपने कद्दावर नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा को लगातार पांचवी बार दतिया विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारना करीब-करीब तय कर लिया है और उनके नाम की सिर्फ औपचारिक घोषणा होना बाकी है, टिकट की दौड़ में भाजपा में उनके अलावा और कोई बड़ा नाम भी नहीं उभरा है, वहीं कांग्रेस अभी तक शोभा भारती, घनश्याम सिंह और अवधेश नायक के नामों में ही उलझी हुई है। निवर्तमान कांग्रेस विधायक राजेन्द्र भारती दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। जब जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह जैसे बड़े नेता इस हफ्ते कार्यकर्ता सम्मेलन करने दतिया आए, तब भी वे दतिया तशरीफ नहीं लाए, उनसे फोन पर बात करने के बाद दिग्विजय ने ही खुलासा किया कि भारती का ऑपरेशन हुआ है और वे दिल्ली में ही इलाज करा रहे हैं। भारती अपनी धर्मपत्नी को टिकट दिलाना चाहते हैं ताकि सहानुभूति लहर का फायदा हासिल हो सके। कांग्रेस में टिकट के दूसरे दावेदार बताए जा रहे स्थानीय राजपरिवार के कुंवर घनश्याम सिंह पहले ही अपनी परंपरागत सीट सेबढा छोड़कर दतिया आने के प्रति अनिच्छा जता चुके हैं। वर्षों पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए अवधेश नायक जरूर पूरी दमदारी से टिकट मांग रहे हैं लेकिन साथ ही यह भी संकल्प जता रहे हैं कि पार्टी यदि उनके बजाए किसी अन्य को मौका देती है तो उसे जिताने के लिए जी जान से जुटेंगे। बहरहाल, आधिकारिक तौर पर अभी भाजपा ने अपने प्रत्याशी के नाम का ऐलान नहीं किया है लेकिन नरोत्तम ने अपनी उम्मीदवारी को सुनिश्चित मानते हुए जोरशोर के साथ चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। वे अत्यंत विनम्र भाव से जनता के दरबार में हाजिरी भरते हुए समर्थन मांग रहे हैं। पिछली हार को लेकर उनका जनता से कोई गिला शिकवा नहीं हैं। नरोत्तम उवाच… दतिया की जनता ने उन्हें लगातार तीन बार जिताकर अपना एमएलए बनाया है, एक बार हरा दिया, तो क्या? अपने प्रतिद्वंदी भारती परिवार के जनाधार को खारिज करते हुए दार्शनिक अंदाज में यह भी कह रहे हैं कि पिछली बार राजेंद्र भारती नहीं जीते थे बल्कि मैं हारा था!
सिंधिया ले गए अदाणी की ढाई हजार करोड़ की फैक्ट्री का श्रेय
शिवपुरी में अदाणी ग्रुप की हथियार फैक्ट्री के प्रोजेक्ट का पूरा श्रेय सिंधिया ले गए हैं। हालांकि भूमिपूजन के जलसे में सीएम भी मौजूद थे लेकिन जैसा कि सीएम का अंदाज है, वे सूबे के विभिन्न इलाकों में आने वाली विकास योजनाओं का श्रेय खुद लेने के बजाए वहां के छत्रपों को तत्काल देने में कोताही नहीं बरतते। शिवपुरी में भी सीएम का यही अंदाज दिखा। हथियार फैक्ट्री के इतर सिंधिया ने सीएम के समक्ष जो भी मांगें रखीं, वे मंच से ही मंजूर कर ली गईं। बहरहाल शिवपुरी को हथियार फैक्ट्री मिलना इस अंचल के औद्योगिक विकास के लिहाज से बड़ा कदम माना जा रहा है। 2,500 करोड़ की लागत वाली अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस की इस फैक्ट्री में हाईटेक हथियार, गोला-बारूद, अत्याधुनिक लॉन्ग-रेंज मिसाइलें और मिशन-रेडी डिफेंस प्रोडक्ट्स का निर्माण किया जाएगा। जाहिर है कि इस प्रोजेक्ट से स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और राज्य में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि महादजी सिंधिया के शासनकाल में मेजर सैंगस्टर की देखरेख में मथुरा, दिल्ली, ग्वालियर, कालपी और गोहद में ऑर्डनेंस फैक्ट्री और मैगज़ीन स्थापित किए गए थे। लगता है कि ज्योतिरादित्य भी अपने पुरखों की इसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।
मुरैना में बह रही उल्टी बयार
भाजपा इस वक्त प्रदेश और देश की सत्ता पर काबिज है, लिहाजा पिछले बारह साल से देश की सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस के नेताओं का भाजपा में पलायन अजूबा कही जाने वाली बात नहीं है लेकिन मुरैना में वाकई में अजूबा हो रहा है। यहां भाजपा से कांग्रेस में पलायन चल रहा है। अभी कल ही भाजपा के पुराने नेता प्रेमकुमार बंसल कांग्रेस में चले गए, अकेले नहीं बल्कि सैकड़ों के दल बल के साथ। निकाय चुनाव सिर पर हैं और अपनी महापौर के भगवा हो जाने के बाद कांग्रेस यहां नए सिरे से जमावट में लगी है, दलित नेता प्रेमकुमार को भाजपा से कांग्रेस में लाए जाने को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। इस दलबदल के जलसे में विधायक समेत कांग्रेस का पूरा स्थानीय नेतृत्व मौजूद था। प्रेमकुमार को कांग्रेस से क्या भरोसा मिला है, ये तो वे ही जानें।
जीतने के लिए कुछ भी करेगा…
व्यापारियों की सबसे बड़ी संस्था चेंबर ऑफ कॉमर्स के चुनाव के लिए प्रचार अभियान पूरे यौवन पर है लेकिन चिंताजनक बात यह है कि व्यापार जगत की मूलभूत समस्याओं और मांगों पर मंथन के साथ शुरू हुआ प्रचार अभियान अब व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप और कटाक्ष तक सीमित होकर रह गया है। जीतने के लिए कुछ भी करेगा… ज्यादातर प्रत्याशी यही ठानकर बैठे हैं। प्रत्याशी अपनी यह रीति नीति बदलकर यदि प्रचार मुहिम को व्यापार हित से जुड़े मसलों तक सीमित रखें तो ज्यादा ठीक रहेगा।
