
दिलीप झा
मध्य क्षेत्र की डायरी
पिछले महीने कांग्रेस मध्यप्रदेश से अपने एक उम्मीदवार को राज्यसभा में भिजवा सकती थी क्योंकि उसके पास मतदान करने वाले विधायकों की संख्या पर्याप्त थी लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी के कारण एआईसीसी की फरमान अथवा पसंद को संसद नहीं पहुंचने दिया गया। यह असाधारण बात है। सूत्र बताते हैं कि मिनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करवाने में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बड़ी भूमिका रही। बता दें कि तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार है और वहां नटराजन के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थी। यह हैरानी की बात है कि मामला कांग्रेस शासित दक्षिण राज्य से निकलकर मध्यप्रदेश पहुंच गया और ऐन वक्त पर नटराजन की उम्मीदवारी निरस्त हो गई। महज दिखावे के लिए कांग्रेस नाटकीय अंदाज में अपने विधायकों को प्लैन बिठाकर बंगलुरु भेजने की तैयारी में थी। लेकिन सारा ठीकरा बीजेपी पर फोड़ते फोड़ते कांग्रेस खुद बैकफुट पर आ गई और प्रदेश की जनता सब समझ गई कि खोट कांग्रेस के अंदर है, बीजेपी में नहीं। बेवजह बीजेपी को बदनाम करने की इनकी फितरत रहती है। हालात ये है कि अलग अलग गुटों में बंटी मध्य प्रदेश कांग्रेस इस समय एक ऐसे कठिन मोड़ पर है, जहाँ पार्टी का हर कदम सवालों के घेरे में है। संगठन के भीतर अनुशासन का अभाव और शीर्ष नेतृत्व की मौन कार्यशैली पार्टी के लिए एक बड़ा संकट बन गई है। हाल ही में दिग्विजय सिंह से जुड़े ‘उज्जैन प्रसंग’ ने पार्टी को राजनीतिक रूप से बैकफुट पर ला खड़ा किया था, लेकिन इस घटना से भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब उत्पन्न हुई, जब प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की मौजूदगी में ही पार्टी के विधायकों और नेताओं द्वारा वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के प्रति अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया गया। यह अनुशासनहीनता का ऐसा निचला स्तर है, जो पार्टी की साख के लिए किसी भी चुनावी हार से ज्यादा घातक साबित हो रहा है।
कांग्रेस के पुराने नेता बिना लाग-लपेट कहते हैं कि सत्ता का मार्ग कुर्ता की बांह’ समेटने से नहीं बल्कि हाथ’ जोड़कर सुगम बनया जाता है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में पार्टी मुख्य रूप से प्रदर्शनों के जरिए सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। निस्संदेह, प्रदर्शनों से राजनीतिक माहौल बनाया जा सकता है, लेकिन सत्ता के शिखर तक पहुँचने के लिए केवल जुझारूपन पर्याप्त नहीं है। अब कांग्रेस को ‘बाहें चढ़ाकर’ सड़कों पर उतरने की उग्र संस्कृति से बाहर निकलकर, जनता और कार्यकर्ताओं के सामने ‘हाथ जोड़कर’ विनम्रता के साथ संगठन बनाने की नई रणनीति अपनानी होगी। जमीनी स्तर पर जुड़ाव और संवाद ही सत्ता का मार्ग प्रशस्त करेगा। पिछले 20 वर्षों में संगठन की जो स्थिति रही है, जहाँ ग्राम पंचायत स्तर तक पहुँच का अभाव है, उसे सुधारने के लिए विनम्रता और सर्व-समावेशी दृष्टिकोण ही एकमात्र विकल्प है।
इस पूरे घटनाक्रम और संगठन में बढ़ती मनमानी से उमंग सिंघार, अरुण यादव और अजय सिंह ‘राहुल’ जैसे कद्दावर नेता बेहद दुखी और नाराज बताए जा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो उन्होंने शीर्ष नेतृत्व को इस गंभीर स्थिति से अवगत करा दिया है। यह स्पष्ट है कि आज मध्य प्रदेश कांग्रेस में ‘सब कुछ ठीक है’ का दावा करना बेमानी होगा। पार्टी के भीतर पनपा यह असंतोष यदि समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो यह संगठन को और गहरे संकट में डाल सकता है। अब समय आ गया है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस ‘एकल नेतृत्व’ की परिपाटी से बाहर निकले और ‘सामूहिक नेतृत्व’ को प्राथमिकता दे। मालवा, विंध्य, बुंदेलखंड, नर्मदापुरम और महाकौशल जैसे अंचलों के जनाधार वाले नेताओं को न केवल उचित प्रतिनिधित्व, बल्कि निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति और अधिकार दिए जाने की सख्त जरूरत है।
यह भी शत-प्रतिशत सही है कि पार्टी के भीतर ऊर्जा का संचार करने के लिए कमलनाथ, अजय सिंह, अरुण यादव, ओंकार सिंह मरकाम, लखन सिंह घनघोरिया, उमंग सिंगार, विक्रांत भूरिया और फूल सिंह बरैया जैसे अनुभवी नेताओं का अनुभव पार्टी की सबसे बड़ी संपत्ति है। साथ ही, 2018 के चुनावों में अरुण यादव की रणनीति को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले चंद्रिका प्रसाद द्विवेदी जैसे कुशल रणनीतिकारों को भी अब संगठन में सक्रिय जिम्मेदारी और सामूहिक नेतृत्व का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है।
इसलिए कांग्रेस आलाकमान को अब इस निर्णय करना चाहिए कि भाजपा के सत्ता के चक्रव्यूह तोड़ना है अथवा मेरा आदमी तेरा आदमी की राजनीति में ही उलझे रहना है जो उसे सत्ता से दूर किए हुए है।
इस बात से कांग्रेस कार्यकर्ता भलीभांति परिचित हैं कि एक तरफ ‘अवांछित बयानों’ और वरिष्ठ नेताओं के प्रति अमर्यादित व्यवहार का बोझ पार्टी की साख को खोखला कर रहा है, तो दूसरी तरफ ‘नेतृत्व की खामोशी’ कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ रही है। अब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को कड़े और निर्णायक कदम उठाने होंगे। जब तक बयान, ढांचा और संवाद तीनों पर ठोस काम नहीं होगा और जनाधार वाले नेताओं को अधिकार संपन्न नहीं बनाया जाएगा, तब तक सत्ता का मार्ग सिर्फ नारों तक सीमित रहेगा। यह कांग्रेस के लिए ध्रुव सत्य है।
मध्य प्रदेश कांग्रेस के सामने अब दो ही विकल्प हैं- या तो वह गुटीय राजनीति और एकल नेतृत्व के अहंकार में इसी चक्रव्यूह में उलझी रहे, या फिर अनुभवी क्षत्रपों को साथ लेकर एक समावेशी सामूहिक नेतृत्व खड़ा करे। सत्ता की दहलीज पार करने के लिए अब ‘संगठनात्मक अधिकारों का विकेंद्रीकरण’ ही एकमात्र समाधान है। अगर कांग्रेस संगठन ऐसा करने में सफल नहीं हो पाती है तो मध्यप्रदेश में उसकी वापसी मुंगेरी लाल के हसीन सपने जैसे ही बने रहेंगे।
