लखनऊ के अलीगंज में सोमवार को हुआ अग्निकांड केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की सामूहिक विफलता का भयावह उदाहरण है. जिस इमारत में 15 युवाओं की जान गई, वहां आग से ज्यादा घातक साबित हुआ प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार का धुआं. यह हादसा एक बार फिर साबित करता है कि भारत में अक्सर लोग आग से नहीं, बल्कि नियमों की अनदेखी और सरकारी तंत्र की निष्क्रियता से मरते हैं.
रिहायशी भवन में चल रहे एनिमेशन ट्रेनिंग सेंटर में उस समय लगभग 30 छात्र मौजूद थे. अचानक आग लगी, धुआं पूरे भवन में फैल गया और कुछ ही मिनटों में वहां अफरा-तफरी मच गई. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भवन में आपातकालीन निकास (इमरजेंसी एग्जिट) तक नहीं था. जिन छात्रों को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिला, वे जान बचाने के लिए बाथरूम में छिप गए. उन्हें लगा होगा कि शायद वहां कुछ देर सुरक्षित रह पाएंगे, लेकिन वही बाथरूम उनकी अंतिम शरणस्थली बन गया. धुएं से दम घुटने के कारण कई छात्रों की मौत हो गई. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कितनी मौतों के बाद हमारा सिस्टम सुधरेगा ? इसी महीने की शुरुआत में दिल्ली के एक होटल में अग्निकांड के कारण जब, 21 लोगों की मौत हुई थी, तो देश भर की राज्य सरकारों ने दावा किया कि सभी शहरों में फायर ऑडिट्स की जा रही हैं. जाहिर है फायर ऑडिट के वो दावे फर्जी थे, अन्यथा लखनऊ का यह भीषण अग्निकांड नहीं होता.घटना के बाद सामने आया कि जिस इमारत का नक्शा आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत हुआ था, उसे वर्षों पहले व्यावसायिक उपयोग में बदल दिया गया था. यह परिवर्तन किसी एक दिन में नहीं हुआ होगा. वर्षों तक वहां संस्थान चलता रहा, छात्र आते रहे, फीस जमा होती रही और अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहे. आखिर क्यों ?
यहीं से इस त्रासदी का सबसे बड़ा और सबसे असहज प्रश्न सामने आता है. यदि भवन में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा था, तो फायर विभाग क्या कर रहा था ? यदि नक्शा आवासीय था, तो विकास प्राधिकरण ने कार्रवाई क्यों नहीं की? यदि भवन का उपयोग नियमों के विरुद्ध हो रहा था, तो स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी ? और यदि जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई ?
दुर्भाग्य से भारत में ऐसी घटनाओं का इतिहास लंबा है. दिल्ली का उपहार सिनेमा कांड, सूरत का कोचिंग सेंटर हादसा, राजकोट का गेमिंग जोन अग्निकांड, दिल्ली के होटल अग्निकांड और अब लखनऊ. हर बार जांच रिपोर्टें बनती हैं, हर बार जिम्मेदारों की सूची तैयार होती है और हर बार कुछ समय बाद सब कुछ भुला दिया जाता है. लेकिन जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है, उनके लिए यह हादसे कभी पुराने नहीं होते.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसआईटी गठित की है, चार अधिकारियों को निलंबित किया गया है और भवन मालिक समेत कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है. यह संतोष जनक है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. क्योंकि समस्या केवल कुछ व्यक्तियों की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की है जिसमें नियमों का पालन कराने वाले तंत्र और नियम तोडऩे वालों के बीच अक्सर एक सुविधाजनक समझौता विकसित हो जाता है.
सवाल यह भी है कि क्या देश में फायर सेफ्टी को अब भी गंभीरता से लिया जा रहा है ? अधिकांश शहरों में कोचिंग संस्थान, हॉस्टल, छोटे अस्पताल, प्रशिक्षण केंद्र और व्यावसायिक भवन ऐसे हैं जहां आपातकालीन निकास, धुआं निकालने की व्यवस्था, अग्निशमन उपकरण और नियमित सुरक्षा ऑडिट जैसी बुनियादी चीजें तक मौजूद नहीं हैं. कागजों में सब कुछ सही दिखाई देता है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग होती है.
लखनऊ की यह घटना दरअसल,पूरे देश के लिए चेतावनी है. यदि अब भी व्यापक स्तर पर सुरक्षा ऑडिट नहीं किया गया, यदि अवैध रूप से चल रहे संस्थानों पर कार्रवाई नहीं हुई, यदि अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं हुई, तो अगली त्रासदी भी किसी शहर में इसी तरह सुर्खियां बनेगी. लखनऊ की आग बुझ चुकी है, लेकिन उससे उठे सवाल अब भी धधक रहे हैं. जब तक सुरक्षा नियमों को कागजी औपचारिकता मानने की मानसिकता खत्म नहीं होगी, जब तक जिम्मेदार अधिकारियों की वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होगी और जब तक भ्रष्टाचार व लापरवाही पर कठोर दंड नहीं होगा, तब तक ऐसी त्रासदियां दोहराती रहेंगी.
