दुनिया भर में मदद की बढ़ती मांगो के बावजूद संयुक्त राष्ट्र धन की भारी कमी से जूझ रहा है: अमीना मोहम्मद

दुनिया भर में मदद की बढ़ती मांगो के बावजूद संयुक्त राष्ट्र धन की भारी कमी से जूझ रहा है: अमीना मोहम्मद

न्यूयॉर्क, 02 जून (वार्ता) संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि दुनिया भर से मदद की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसकी विकास समन्वय प्रणाली धन की भारी कमी से जूझ रही है। एजेंसी ने विभिन्न देशों में अपने काम को मजबूत करने के लिए अपनी नई ‘यूएन80 पहल’ के तहत तुरंत सुधार करने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव अमीना मोहम्मद ने न्यूयॉर्क में एक बैठक में कहा कि इस समय दुनिया भर में विकास को लेकर उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं, लेकिन साथ ही संकट, कर्ज का बोझ और असमानता भी तेजी से बढ़ रही है।

सुश्री अमीना ने आगाह किया कि बजट में हो रही कटौती की वजह से संयुक्त राष्ट्र को कई देशों से अपना दायरा समेटने पर मजबूर होना पड़ रहा है। सदस्य देशों से मिलने वाली मदद में भारी कमी के कारण दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र को अपने काम और कर्मचारियों को लेकर बेहद कड़े फैसले लेने पड़ रहे हैं। उप महासचिव ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र की इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में उसके ‘निवासी समन्वयक’ (रेजिडेंट कोआर्डिनेटर) होते हैं, जो इस काम के मजबूत स्तंभ हैं। उन्होंने कहा कि 93 प्रतिशत देश इन समन्वयकों के काम की तारीफ करते हैं, जबकि 90 प्रतिशत देश इन्हें संयुक्त राष्ट्र का मुख्य चेहरा मानते हैं। अब इस व्यवस्था को और बड़ा रूप दिया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की नई सुधार योजना के तहत इन समन्वयकों से उम्मीद की जा रही है कि वे 160 से अधिक देशों में जरूरी बदलाव लागू करने में मुख्य भूमिका निभाएंगे।

सुश्री अमीना ने कहा कि आपदा या युद्ध के समय ये समन्वयक विकास, मानवीय मदद और शांति स्थापित करने वाले कामों को एक साथ जोड़ने का काम करते हैं। जब तक किसी क्षेत्र में बड़ी मानवीय सहायता पहुंचती है, तब तक यही लोग सबसे पहले मोर्चा संभालते हैं। उप महासचिव ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र ने अपने काम करने के तरीकों में सुधार करके वर्ष 2025 में लगभग 98 करोड़ डॉलर से अधिक की बचत भी की है। इसके अलावा, खर्च कम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की 33 प्रतिशत इमारतें अब साझा दफ्तरों के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं। इस बचत के बावजूद पैसों का संकट कम नहीं हुआ है। यह पूरी व्यवस्था देशों की इच्छा से मिलने वाले दान पर चलती है, जो कि अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गया है।

सुश्री अमीना ने कहा कि वर्ष 2025 में इस काम के लिए 28.1 करोड़ डॉलर की जरूरत थी, लेकिन केवल 23.6 करोड़ डॉलर ही मिल पाए। इस तरह करीब 4.6 करोड़ डॉलर की कमी रह गई। बजट कम होने की वजह से 36 प्रतिशत समन्वयकों के दफ्तरों में पूरे कर्मचारी तक नहीं हैं। उप महासचिव ने जोर देकर कहा कि मौजूदा व्यवस्था में कागजी और प्रशासनिक खर्च बहुत ज़्यादा हैं, इसलिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों को इस पर तुरंत विचार करने की जरूरत है। सुश्री अमीना ने कहा कि नए सुधारों के तहत, अब दफ्तरों को स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ढाला जाएगा ताकि राज्यों और क्षेत्रों को तेजी से और सीधे मदद पहुंचाई जा सके।हवाई दावों के बजाय अब मुख्यालय में नेतृत्व को मजबूत किया जाएगा और डिजिटल टूल्स, डेटा सिस्टम तथा भविष्य का अनुमान लगाने वाली तकनीकों का विस्तार किया जाएगा। उद्देश्य सिर्फ आज के संकटों को टालना नहीं, बल्कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करना भी है। संयुक्त राष्ट्र को इसके लिए पूरी तरह तैयार और सक्षम होना होगा।

उप महासचिव ने कहा कि समन्वय का यह तरीका काम करता है या नहीं, इस पर अब कोई बहस नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या दुनिया इस व्यवस्था को चलाने के लिए जरूरी संसाधन और पैसे देने को तैयार है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि साल 2030 के सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने का यह आखिरी दौर है, और ‘यूएन80 पहल’ का मकसद इस अंतिम समय में वैश्विक विकास को नई रफ्तार देना है।

 

 

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