
ग्वालियर। गौतम बुद्ध के विभिन्न जनमों के वृत्तांत पर आधारित जातक- कथाएं विश्वकथा साहित्य की उद्गम स्थली हैं। प्रसिद्ध विद्वान विंटरनित्ज़ ने विश्व- साहित्य पर जातक कथाओं के प्रभाव को स्वीकार किया है। आज जब देश में भारतीय ज्ञान परम्पराओं की बात करते हैं तब बौद्ध – साहित्य की इस निधि को अनदेखा नहीं कर सकते, क्यों कि भारत की ज्ञान परम्परा एकांगी नहीं हैं। यहां संस्कृतियां और परम्पराएं परस्पर संवाद करती हैं।
प्रसिद्ध विद्वान व काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर सदानंद शाही ने आचार्य हरिहरनिवास द्विवेदी स्मृति व्याख्यान देते हुए मुख्य वक्ता के रूप में जीवाजी विश्वविद्यालय के गालव सभागार में यह विचार व्यक्त किए। जाने- माने पत्रकार डॉ सुरेश सम्राट ने आयोजन की अध्यक्षता की। मंच पर जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुलसचिव डॉ राजीव मिश्र व अवकाश प्राप्त न्यायाधीश श्याम विहारी भार्गव की विशेष उपस्थिति रही।
इस अवसर पर अतिथियों व विशिष्ट जनों को द्विवेदी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘ ग्वालियर दर्शन ‘ व ‘ गोपाचल आख्यान ‘ भेंट में दी गई
आचार्य हरिहरनिवास द्विवेदी स्मृति व्याख्यान समारोह समिति व जीवाजी विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में यह व्याख्यान आयोजित हुआ जिसके संयोजक जयन्त सिंह तोमर और उमेशचंद्र पाठक थे।
प्रोफ़ेसर शाही ने जातक कथाओं के महत्व पर बोलते हुए कहा कि संवाद की प्रक्रिया किस तरह सभ्यता के भीतर चलती है जातक कथाएं उसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। सौफ्ट स्किल से परिचय दुनिया में पहली बार इन्हीं कथाओं ने कराया जो नीति के विभिन्न पहलू तो बताती ही हैं, यह भी सिखाती हैं कि जिस पृथ्वी पर मनुष्य अपना मालिकाना हक मान रहा है वह पशु-पक्षियों की भी उतनी ही है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में आचार्य हरिहर निवास द्विवेदी के योगदान पर बोलते हुए डॉ सुरेश सम्राट ने कहा कि जब भारतीय ज्ञान परम्परा की बात हो रही है तब द्विवेदी के ग्रंथ पढ़ कर हमें ग्वालियर की ज्ञान परम्परा से भी परिचित होना चाहिए। द्विवेदी जी ने ग्वालियर में रहकर पत्रकारिता, इतिहास, संस्कृति, संगीत, साहित्य, कला, पुरातत्व और विधि जैसे क्षेत्रों में जो काम किया वैसा ग्वालियर में न पहले हुआ, न उनके बाद। मुरार में उनका घर दुनिया भर के गुणीजनों के आकर्षण का केंद्र रहा जहां द्विवेदी के सान्निध्य में कुछ वर्ष बिताने का समय स्वयं उन्हें भी मिला। भू-राजस्व संहिता के प्रकाशन से उन्हें इतनी आमदनी होती थी कि एक आदमी दिनभर मनीआर्डर की रसीदों पर सील लगाने के लिए ही बैठा रहता था। जीवाजी विश्वविद्यालय के लिए उन्होंने ‘ ग्वालियर शोध संस्थान ‘ के माध्यम से ‘ ग्वालियर दर्शन ‘ और ‘ गोपाचल आख्यान ‘ जैसी दुर्लभ पुस्तकों का प्रकाशन कराया। वे जहां तक काम करके गये हमें उससे आगे काम कर उनके अधूरे कामों को पूरा करने की जरूरत है। द्विवेदी की शानदार लाइब्रेरी अब सीतामऊ के नटनागर शोध संस्थान का हिस्सा बन गई है। वे नरवर पर एक शानदार किताब लाना चाहते थे। उन्हें दस साल और मिल जाते तो ग्वालियर चंबल क्षेत्र के ज्ञान में और भी बहुत कुछ जोड़ कर जाते।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए जयंत सिंह तोमर ने कहा कि द्विवेदी जैसे विद्वानों की स्मृति को बनाए रखने के लिए व्याख्यान और आयोजनों का क्रम सोलह साल से निरंतर चल रहा है। जिन्होंने ज्ञान -गरिमा के क्षेत्र में ग्वालियर का नाम उज्ज्वल किया है उन्हें याद करना सबका सामूहिक कर्तव्य है।
धन्यवाद ज्ञापन में व्याख्यान के संयोजक उमेशचंद्र पाठक ने कहा कि द्विवेदी जैसे विद्वानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की भावना ने उन्हें इस आयोजन के लिए प्रेरित किया।
आयोजन में ग्वालियर के गण्यमान्य लोगों ने उपस्थिति दर्ज की।
