नयी दिल्ली , 22 अप्रैल (वार्ता) उद्योग मंडल एसोचैम का आकलन है कि कच्चे तेल की कीमतें 90–100 डॉलर प्रति बैरल होने पर भी भारत में सात प्रतिशत वार्षिक से अधिक की आर्थिक वृद्धि दर हासिल करने की संभावना मौजूद है।
एसोचैम ने इस संबंध में बुधवार को एक विश्लेषण में कहा कि उच्च ऊर्जा लागतों के प्रति भारत की मजबूती पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है। देश ने गंभीर तेल झटकों को झेला है, फिर भी आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी रही है। विश्लेषण से पता चलता है कि भारत ने उच्च ऊर्जा कीमतों के बावजूद अपनी विकास दर को बनाए रखने की क्षमता दिखाई है।
विश्लेषण में वर्ष 2000-01 से 2025-26 की अवधि के आंकड़ों के विश्लेषण से यह सामने आया है कि भारत ने अपनी कुछ सबसे मजबूत वार्षिक वृद्धि मध्यम से उच्च कच्चे तेल की कीमतों के दौरान दर्ज की । उदाहरण के लिए, 2022-23 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रही, जबकि तेल की कीमत (भारतीय क्रूड बास्केट) औसतन 93 डॉलर प्रति बैरल थी। वहीं 2023-24 में तेल की कीमत 82 डॉलर प्रति बैरल होने के बावजूद वृद्धि दर 7.2 प्रतिशत के स्तर पर बनी रही।
इससे पहले 2011-14 के दौरान जब तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर थीं, तब भी भारत की जीडीपी वृद्धि दर 5.2 प्रतिशत से 6.4 प्रतिशत के बीच रही। विश्लेषण की अवधि में सबसे बड़ी गिरावट (5.78 प्रतिशत की गिरावट) वर्ष 2020-21 में दर्ज की गई, जब तेल की कीमतें पिछले दो दशकों के सबसे निचले स्तर (45 डॉलर प्रति बैरल से कम) पर थीं। यह गिरावट पूरी तरह से कोविड-19 महामारी के कारण हुई थी।
एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल कुमार मिंडा ने कहा कि भारत की वृद्धि मुख्य रूप से घरेलू उपभोग पर आधारित है, जो आपूर्ति पक्ष को भी मजबूती देती है। इससे फैक्ट्री विस्तार, रोजगार में वृद्धि और आय में बढ़ोतरी होती है, जिससे विकास का एक सकारात्मक चक्र बनता है और अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत होती है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का बुनियादी ढांचे पर बढ़ता खर्च, विशेष रूप से पूंजीगत व्यय, बाहरी झटकों के प्रभाव को कम करने में मदद करता है।
