खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में महाराष्ट्र की मलखंभ टीम का दबदबा, कैप्टन देवीदास कामड़ी ने छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों की प्रतिभा को सराहा, सरगुजा में आदिवासी रत्न विजेता ने खेल को मुख्यधारा में जोड़ने की उठाई मांग

सरगुजा | छत्तीसगढ़ के सरगुजा में आयोजित ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स’ में महाराष्ट्र की मलखंभ टीम अपनी चमक बिखेर रही है। प्रतियोगिताओं के शुरुआती दौर में महाराष्ट्र की टीम अंक तालिका में नंबर वन पर बनी हुई है। टीम के कैप्टन और महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘आदिवासी रत्न’ से सम्मानित खिलाड़ी देवीदास कामड़ी ने अपनी सफलता का श्रेय ‘अतुल्य स्पोर्ट्स एकेडमी’ को दिया है। उन्होंने बताया कि उनके गांव में पवन अडोलेकर द्वारा संचालित यह एकेडमी आदिवासी बच्चों को पूरी तरह निशुल्क प्रशिक्षण प्रदान करती है। देवीदास स्वयं कई बार स्टेट चैंपियन रह चुके हैं और पहली बार नेशनल स्तर पर खेलते हुए अपनी टीम का कुशलतापूर्वक नेतृत्व कर रहे हैं, जिससे इस पारंपरिक खेल को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की उम्मीद जगी है।

विशेष बातचीत के दौरान देवीदास कामड़ी ने छत्तीसगढ़ की मलखंभ टीम के कौशल और उनकी कड़ी मेहनत की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने याद किया कि 2 साल पहले ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ के मंच पर छत्तीसगढ़ की टीम के रोमांचकारी करतबों ने पूरे देश का दिल जीत लिया था। देवीदास ने कहा कि छत्तीसगढ़ के कोच योगेश सर अपने खिलाड़ियों पर बहुत मेहनत करते हैं और उनकी टीम से महाराष्ट्र के खिलाड़ियों को काफी प्रेरणा मिली है। उन्होंने स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों की फुर्ती और तकनीक बेमिसाल है, जिससे उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला है। दोनों राज्यों की टीमों के बीच यह खेल भावना ट्राइबल गेम्स के मुख्य उद्देश्य को चरितार्थ कर रही है।

देवीदास कामड़ी और उनकी टीम ने सरकार से गुहार लगाई है कि मलखंभ को ‘खेलो इंडिया’ के मुख्य खेलों की सूची में स्थायी रूप से शामिल किया जाए। उनका मानना है कि यदि इस खेल को इसी तरह सरकारी प्रोत्साहन मिलता रहा, तो ट्राइबल क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को न केवल एक बड़ा मंच मिलेगा, बल्कि उन्हें बेहतर भविष्य और आर्थिक सहायता भी प्राप्त होगी। देवीदास ने खेलों इंडिया ट्राइबल गेम्स के आयोजन के लिए सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह मंच मेहनत करने वाले बच्चों के लिए नई संभावनाएं खोल रहा है। खिलाड़ियों का मानना है कि पारंपरिक खेलों को मुख्यधारा में लाने से भारत की सांस्कृतिक विरासत और खेल कौशल दोनों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिलेगी।

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