भारतीय क्रिकेट के पितामह महाराजा रणजीत सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष नमन, कलाई के जादूगर ने अंग्रेजों के देश में मनवाया था अपनी बल्लेबाजी का लोहा

जामनगर | भारतीय क्रिकेट के इतिहास में ‘नवानगर के महाराजा’ जाम साहब रणजीत सिंह जी का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। 10 सितंबर 1872 को जन्मे रणजीत सिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंग्लैंड के लिए खेलने वाले पहले भारतीय क्रिकेटर थे। अपनी पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए रणजीत सिंह ने वहां क्रिकेट की बारीकियों को सीखा और जल्द ही अपनी अनोखी बल्लेबाजी शैली से सबको हैरान कर दिया। उन्हें ‘कलाई का जादूगर’ कहा जाता था क्योंकि उन्होंने ‘लेग ग्लांस’ जैसे शॉट्स को दुनिया के सामने पेश किया था। 1895 में ससेक्स के लिए खेलते हुए उन्होंने अपने पदार्पण मैच में ही शानदार प्रदर्शन कर इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह पक्की कर ली थी।

रणजीत सिंह का अंतरराष्ट्रीय करियर भले ही छोटा रहा, लेकिन उनका प्रभाव बेहद गहरा था। 1896 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैनचेस्टर टेस्ट में उन्होंने नाबाद 154 रनों की यादगार पारी खेली। उनके प्रथम श्रेणी (First Class) क्रिकेट के आंकड़े आज भी किसी चमत्कार से कम नहीं लगते; उन्होंने 307 मैचों में 72 शतकों की मदद से 24,692 रन बनाए। खास बात यह है कि 1895 से लगातार 10 सीजनों तक उन्होंने हर बार 1,000 से अधिक रन बनाने का कीर्तिमान स्थापित किया। 1907 में नवानगर की सत्ता संभालने के बाद भी उनका क्रिकेट के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ और वे भारतीय क्रिकेट के संरक्षक बने रहे।

2 अप्रैल 1933 को 60 वर्ष की आयु में इस महान खिलाड़ी का निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी हर भारतीय क्रिकेटर के रगों में दौड़ती है। उनके सम्मान में ही भारत के सबसे प्रतिष्ठित घरेलू टूर्नामेंट का नाम ‘रणजी ट्रॉफी’ रखा गया, जो आज भी नए टैलेंट को तराशने का सबसे बड़ा मंच है। रणजीत सिंह ने न केवल तकनीक के स्तर पर क्रिकेट को समृद्ध किया, बल्कि एक भारतीय होकर गोरों के देश में उनकी ही टीम की कप्तानी कर स्वाभिमान की नई मिसाल पेश की। आज उनकी पुण्यतिथि पर पूरा खेल जगत उन्हें एक ऐसे युगपुरुष के रूप में याद कर रहा है जिन्होंने भारतीय क्रिकेट की नींव रखी थी।

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