क्या भाजपा का आदिवासी पार्टी को समर्थन मिलेगा?

मालवा- निमाड़ की डायरी
संजय व्यास

विधानसभा में एक इकलौता विधायक, आवश्यक 10 विधायकों का समर्थन भी जुटाना मुश्किल और ऐसे में भारतीय आदिवासी पार्टी (बाप) का राज्य सभा चुनाव में उम्मीदवार उतारने का ऐलान कोई मजाक नहीं है. दरअसल पार्टी को इसमें अवसर नजर आ रहा है. प्रदेश से जून तक राज्य सभा की तीन सीटें रिक्त हो रही है. आगामी अप्रैल-मई में इसके लिए चुनाव की संभावना है. 230 सदस्यीय विधान सभा में वोटों के गणित में 2 सीटें भाजपा को जाना तय है, सब कुछ ठीक रहा तो 1 सीट कांग्रेस आसानी से निकाल लेगी. कांग्रेस की क्रास वोटिंग की आशंका के बीच बाप के कार्यकारी प्रदेशाध्यक्ष सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार ने पासा चल दिया है.

कमलेश्वर डोडियार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को पत्र लिखकर आगामी राज्यसभा चुनाव में भारतीय आदिवासी पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन देने की मांग की है. पत्र में कहा कि जब भाजपा और कांग्रेस आदिवासी क्षेत्रों में जाकर वोट मांगते हैं और सरकार बना लेते हैं. तो आदिवासियों का भी अधिकार है कि राज्यसभा की उम्मीदवारी के लिए उन्हें भी दोनों प्रमुख पार्टियों का समर्थन मिले और राज्य सभा में बाप का प्रतिनिधित्व हो जाए.

बाप ने भले ही समर्थन मांगा, पर कांग्रेस अपनी सीट कभी दूसरे को नहीं देने वाली है. जीत के लिए 58 वोट जरूरी है. कांग्रेस के पास 65 विधायक हैं, लेकिन हकीकत में यह संख्या घटकर 63 रह गई है. बीना से विधायक निर्मला सप्रे पर दलबदल कानून के तहत मामला चल रहा है, और मुकेश मल्होत्रा वोट नहीं डाल पाएंगे. यानी कांग्रेस के पास 58 के मुकाबले सिर्फ 5 वोट अतिरिक्त हैं. यही सबसे बड़ा खतरा है. अगर 5-6 विधायक भी क्रॉस वोटिंग कर दें या मतदान से दूर रहें, तो कांग्रेस अपनी पक्की सीट भी गंवा सकती है. भाजपा जोड़-तोड़ में यदि तीसरी सीट जीतना सुनिश्चित देखेगी तो ही दांव लगाएगी, अन्यथा नहीं. हां, अगर कांग्रेस का खेल बिगाडऩा हो और बाप कांग्रेस के आदिवासी विधायकों में सेंध लगान लेने का दावा करे तो भाजपा बाप को समर्थन दे सकती है. 165 विधायकों के साथ भाजपा 116 वोट लगाकर दो सीटें आसानी से जीत सकती है . इसके बाद भी उसके पास करीब 47 वोट बचते हैं यानी तीसरी सीट के लिए सिर्फ 11 वोट की कमी. अगर बाप इन 11 वोटों की सुनिश्चितता दे तो भाजपा भारत आदिवासी पार्टी का उम्मीदवार अपने समर्थन के साथ उतार सकती है.

दो पाटन के बीच पिसे प्राचार्य

शाजापुर के प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन महाविद्यालय में स्नेह सम्मेलन के दौरान मंच पर जगह पाने को लेकर भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन का विद्यार्थी परिषद से जमकर विवाद हो गया. इसमें पिस गए प्राचार्य. उन पर आरोप लगाया गया कि कार्यक्रम में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रतिनिधियों को तो मंच पर ससम्मान स्थान दिया गया, जबकि उनके इशारे पर भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन कार्यकर्ताओं को कुर्सियां तक नसीब नहीं हुईं. इस पर प्राचार्य के एक बयान ने आग पर घी का काम कर दिया. प्राचार्य ने यह कहकर विवाद को और हवा दे दी कि भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन को पहले भी मंचासीन नहीं किया गया था, इसलिए इस बार भी मंच पर नहीं बैठाया गया. इसी बयान ने कार्यकर्ताओं की नाराजगी को आक्रोश में बदल दिया और उन्होंने कालेज बंद कर मुख्य गेट से आवाजाही रोक दी. आखिर प्राचार्य ने खेद प्रकट कर पीछा छुड़ाया.

 

खटास दूर कर एक मंच पर ले आए शाह

विगत दिनों खंडवा भाजपा की आजीवन सदस्यता निधि की महत्वपूर्ण बैठक हंगामे की भेंट चढ़ गई थी. बीच बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष पिंकी वानखेड़े ने पार्टी बैठकों में उन्हें बुलाने से परहेज करने पर जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह तोमर सहित विधायक कंचन तनवे को कटघरे में खड़ा किया था. तब इसका ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ते हुए जैसे-तैसे मामला शांत हुआ था, पर वानखेड़े के मन की खटास दूर नहीं हुई थी. कंचन तनवे और पिंकी वानखेड़े के बीच लंबे समय से चली आ रही खींचतान की बातें विधयक व जनजातीय मंत्री विजय शाह के संज्ञान में आने पर उन्होंने सभी के बीच सुलह करवाई और विक्रमोत्सव-2026 का आयोजन के मौके पर विधायक कंचन मुकेश तन्वे और पिंकी सुदेश वानखेड़े सहित सभी गुटबाज नेताओं को एक मंच पर ले आए और फिर गुड़ी पड़वा एवं नववर्ष की शुभकामनाओं का सिलसिला चल पड़ा.

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