नई दिल्ली | पश्चिम एशिया में जारी भीषण सैन्य संघर्ष अब केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने वैश्विक खाद्य सुरक्षा की नींव हिला दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जहाँ से दुनिया का $46\%$ यूरिया और $20\%$ उर्वरक निर्यात होता है, वहां ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कड़े नियंत्रण के बाद सप्लाई चेन पूरी तरह ठप हो गई है। कतर की दिग्गज कंपनी ‘कतर-एनर्जी’ ने अपने दुनिया के सबसे बड़े यूरिया प्लांट में उत्पादन रोक दिया है, जो अकेले वैश्विक आपूर्ति का $14\%$ हिस्सा संभालता था। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद की इस कमी से अंतरराष्ट्रीय कृषि व्यवस्था चरमरा सकती है।
इस संकट का सबसे भयावह असर भारत और ब्राजील जैसे देशों पर पड़ रहा है, जो अपनी यूरिया और फास्फेट की जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर हैं। भारत अपनी खाद जरूरतों का $40\%$ हिस्सा इसी युद्धग्रस्त मार्ग से मंगवाता है, जिसके चलते देश के तीन बड़े यूरिया प्लांट बंद करने पड़े हैं। वहीं, दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन निर्यातक ब्राजील भी संकट में है क्योंकि उसकी खाद आपूर्ति का आधा हिस्सा इसी मार्ग से आता है। उर्वरकों की कमी के कारण उत्तरी गोलार्ध में फसलों की बुवाई प्रभावित हो रही है, जिससे भविष्य में अनाज के उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका है।
बाजार में यूरिया की कीमतें पिछले एक सप्ताह में $40\%$ बढ़कर $700$ डॉलर प्रति मीट्रिक टन के पार पहुँच गई हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि युद्ध लंबा खिंचा, तो नाइट्रोजन उर्वरकों की कीमतें मौजूदा स्तर से दोगुनी हो सकती हैं। अमेरिका में भी खाद की आपूर्ति में $25\%$ की गिरावट दर्ज की गई है। ईरान द्वारा सऊदी अरब और यूएई के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाने की धमकी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो चावल, गेहूं और मक्का जैसी मुख्य फसलों की पैदावार घटने से दुनिया भर में ‘अकाल’ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

