भारत-कनाडा: अलग रहने में जोखिम अधिक, साथ रहने में अवसर अधिक

नयी दिल्ली, 05 मार्च (वार्ता) कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की नई दिल्ली यात्रा एक ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक व्यवस्था में उथल-पुथल मची हुई है। उनकी भारत यात्रा कनाडा के वैश्विक संबंधों में विविधता लाने का स्पष्ट संकेत देती है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब उसके सबसे महत्वपूर्ण भागीदार और पड़ोसी अमेरिका के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। उल्लेखनीय है कि दावोस में श्री ट्रंप की वैश्विक दृष्टि की आलोचना करने वाला श्री कार्नी का भाषण चीन के साथ उनके संपर्क के तुरंत बाद आया, जो बढ़ती अनिश्चितता के बीच कनाडा की ‘हेजिंग’ (संतुलन बनाने की नीति) को रेखांकित करता है। पश्चिम एशिया में फैलती आग ने व्यावहारिक और स्थिर साझेदारी की आवश्यकता को और गहरा कर दिया है।

इस जटिल पृष्ठभूमि में, भारत-कनाडा संबंधों में लगभग 360-डिग्री का बदलाव आया है। कुछ समय पहले तक, यह रिश्ता आरोपों, राजनयिक निष्कासन और राजनीतिक विश्वास की कमी से परिभाषित होता था। कनाडा में राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव और प्रमुख साझेदारियों को तेजी से बहाल करने की जरूरत ने संबंधों को फिर से पटरी पर लाने के लिए मजबूर किया है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में विश्वास का होना बहुत महत्वपूर्ण है, जिसके लिए दोनों तरफ से निरंतर प्रयास और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। भारत और कनाडा के बीच उच्चतम स्तर पर विश्वास के क्षरण के कारण राजनयिकों की वापसी हुई, संवाद रुक गया और व्यापार वार्ताएं अधर में लटक गईं। हालाँकि, कूटनीति का इतिहास शायद ही कभी सीधा होता है। जैसे-जैसे भारत और कनाडा संबंधों को बहाल करने की दिशा में काम हो रहा है, इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि अब इन मतभेदों को संस्थागत माध्यमों से प्रबंधित करना एक जरूरत है।

उदाहरण के लिए, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल अपनी कनाडाई समकक्ष नथाली जी. ड्रौइन के साथ नियमित रूप से बैठकें कर रहे हैं। इन संपर्कों का उद्देश्य बयानबाजी के बजाय संबंधों को बेहतर बनाने के लिए ठोस कार्यवाही करना है। प्रधानमंत्री कार्नी की यात्रा के बाद जारी भारत-कनाडा संयुक्त बयान समर्पित सुरक्षा और कानून प्रवर्तन के संपर्क तंत्र बनाने के साथ-साथ सूचना साझाकरण को बढ़ाने पर जोर देता है। भारत-कनाडा संबंधों की बहाली में उर्जा मुख्य स्तंभ बन गई है। कनाडा-भारत मंत्रिस्तरीय ऊर्जा वार्ता को फिर से शुरू करना और प्रस्तावित भारत-कनाडा रणनीतिक ऊर्जा साझेदारी को आगे बढ़ाना दोनों के संबंधों में महत्वपूर्ण आयाम बन गया है। भारत के लिए यूरेनियम की विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करना एक रणनीतिक आवश्यकता है। दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम उत्पादकों में से एक कनाडा भारत की इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। साथ ही एलएनजी, एलपीजी, कच्चे तेल और पोटाश पर चल रही चर्चाएं संबंधों की बुनियाद को मजबूत करती हैं। भारत और कनाडा दोनों के लिए अमेरिका के साथ संबंध उनकी विदेश नीति में सर्वोपरि बने हुए हैं। फिर भी, उन द्विपक्षीय संबंधों पर छाई अनिश्चितता ने भारत-कनाडा संबंधों को एक ऐसी रणनीतिक प्रमुखता दी है जो पहले गायब थी।

दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 15 अरब कनाडाई डॉलर से कम का है, जो जी-20 अर्थव्यवस्थाओं के हिसाब से नगण्य है। दोनों के बीच 2010 से चल रही व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सेपा) की बातचीत अब गति पकड़ती दिख रही है। 2026 के अंत तक बातचीत पूरी करने और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 70 अरब कनाडाई डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है, जो एक बड़ा कदम है।
भारत-कनाडा संबंधों का यह सुधार अब रक्षा और समुद्री सुरक्षा सहयोग तक भी फैल रहा है। रक्षा वार्ता को संस्थागत बनाने और प्रशिक्षण अभ्यासों में सहयोग बढ़ाने का निर्णय एक अधिक उद्देश्यपूर्ण जुड़ाव का संकेत देता है। कनाडा द्वारा भारत में ‘डिफेंस अटैची’ की नियुक्ति और भारत द्वारा वाशिंगटन स्थित अपने ‘डिफेंस अटैची’ को कनाडा के लिए मान्यता देना, ऐसे संस्थागत जुड़ाव हैं जो राजनयिक तनाव के समय में ‘शॉक एब्जॉर्बर’ का काम करते हैं। अंततः लोगों के बीच आपसी संबंधों को बनाए रखना और प्रतिभाओं की आवाजाही को सुव्यवस्थित करना इस रिश्ते को मजबूती देने के लिए आवश्यक बना रहेगा। बेशक, पुराने मुद्दे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन अब दोनों देशों ने पहचान लिया है कि अलग रहने के जोखिम अधिक हैं और साथ जुड़ने में बड़े अवसर छिपे हैं।

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