बाजार में रासायनिक रंगों को चुनौती दे रहा वन विभाग का हर्बल गुलाल

इंदौर: होली की आहट के साथ शहर के बाजारों में इस बार रंगों के बीच एक सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है. रासायनिक रंगों के विकल्प के रूप में वन उत्पादों से तैयार हर्बल (इको-फ्रेंडली) गुलाल की मांग बढ़ने लगी है. ये रंग किसी औद्योगिक इकाई में नहीं, बल्कि इंदौर वन मंडल के अंतर्गत चोरल की प्राथमिक लघु वनोपज सहकारी समिति से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए जा रहे हैं.
समिति की महिलाएं पिछले कुछ वर्षों से पलाश (टेसू) के फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार कर रही हैं. फरवरी अंत में खिलने वाले इन फूलों को एकत्र कर सुखाया जाता है और बारीक पाउडर बनाया जाता है. इसमें गुलाब जल, अरारोट और खाद्य श्रेणी के सुरक्षित रंग मिलाकर चार रंग गुलाबी, केसरिया, हरा और पीला तैयार किए जाते हैं. 100 ग्राम के पैकेट की कीमत लगभग 40 से 50 रुपए रखी गई है, ताकि आमजन इसे आसानी से खरीद सकें.

यह जानकारी देते हुए वनमंडलाधिकारी (सोशल फॉरेस्ट्री) प्रदीप मिश्रा, ने बताया कि पलाश का फूल परंपरागत रूप से होली से जुड़ा रहा है और प्राकृतिक रंगों का उपयोग हमारी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने के साथ पर्यावरणीय संतुलन को भी मजबूत करता है. उनका कहना है कि कई कृत्रिम रंगों में भारी धातुएं और रासायनिक तत्व पाए जाते हैं, जो त्वचा व आंखों के लिए हानिकारक हो सकते हैं, जबकि हर्बल रंग अपेक्षाकृत सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल होते हैं. वहीं विशेषज्ञ बताते हैं कि बाजार में बिकने वाले कुछ सस्ते रंगों में लेड ऑक्साइड, कॉपर सल्फेट और कृत्रिम डाई जैसे तत्व पाए जा सकते हैं, जो एलर्जी और त्वचा रोग का कारण बनते हैं. इसके विपरीत पौधों से बने रंग जैव-अवक्रमणीय होते हैं और जल व मिट्टी को प्रदूषित नहीं करते.

ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका का सशक्त माध्यम
उन्होंने बताया कि हालांकि शहर में हर्बल गुलाल के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, फिर भी बड़े पैमाने पर बिकने वाले सस्ते रासायनिक रंगों से कड़ी प्रतिस्पर्धा बनी हुई है. सीमित प्रचार-प्रसार भी एक चुनौती है. इसके बावजूद पिछले वर्ष चोरल समिति ने इंदौर के साथ-साथ खंडवा और खरगोन वन मंडलों की मांग भी पूरी की थी. मिश्रा ने बताया कि यह पहल केवल रंग निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका का सशक्त माध्यम भी है. हर्बल गुलाल की खरीद से वन आधारित रोजगार और पर्यावरण संरक्षण दोनों को समर्थन मिलता है.

लघु वनोपज सहकारी समिति का ‘विंध्य हर्बल’ ब्रांड गुलाल भी उपलब्ध
प्रदीप मिश्रा ने बताया कि इस वर्ष होली अपेक्षाकृत जल्दी होने से पलाश के फूल पूरी तरह नहीं खिल पाए हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है. इसके बावजूद समिति लक्ष्य पूर्ति के लिए प्रयासरत है. वहीं मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज सहकारी समिति के ‘विंध्य हर्बल’ ब्रांड के तहत भी रियायती दर पर हर्बल गुलाल उपलब्ध कराया जा रहा है. भोपाल स्थित वन भवन काउंटर पर 50 ग्राम का पैकेट 30 रुपए में बेचा जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नागरिक प्राकृतिक रंगों को प्राथमिकता दें, तो त्योहार की उमंग के साथ पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका दोनों को मजबूती मिल सकती है.

Next Post

जैन मंदिर में सिद्धचक्र महामंडल विधान, शिल्पकार असलम ने लिया जिन दर्शन का संकल्प

Sat Feb 28 , 2026
भोपाल। फाल्गुन मास की अष्टानिका महापर्व के अवसर पर अयोध्या नगर जैन मंदिर में 24 फरवरी से 3 मार्च तक सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्वशांति महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। विधान के दौरान उस समय भावुक दृश्य बना जब निर्माणाधीन 41 फीट ऊंचे मानस्तंभ के शिल्पकार मोहम्मद असलम […]

You May Like

मनोरंजन