चेन्नई, 02 जनवरी (वार्ता) उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने विकसित भारत के निर्माण में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए निरंतर सीखने, नैतिक मूल्यों और उभरती तकनीकों एवं कृत्रिम बुद्धिमता के युग में अनुकूलनशीलता पर बल दिया है।
डॉ. एम.जी.आर. शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान के 34वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए श्री राधाकृष्णन ने शुक्रवार काे स्नातकों से ईमानदारी, दृढ़ता और राष्ट्र सेवा की भावना से उत्कृष्टता प्राप्त करने को कहा। उपराष्ट्रपति ने नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए स्नातकों को बधाई दी और कहा कि दीक्षांत समारोह ज्यादा जिम्मेदारियों और अवसरों के साथ जीवन के नये चरण के आरंभ का प्रतीक है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि स्नातक पेशेवर दक्षता, करुणा और प्रतिबद्धता के जरिये समाज में सकारात्मक योगदान देंगे। ज्ञान और समुद्री व्यापार के केंद्र के रूप में तमिलनाडु की ऐतिहासिक भूमिका को याद करते हुए श्री राधाकृष्णन ने कहा कि इन तटों के व्यापारियों ने भारत के विचारों, नैतिकता और संस्कृति को दुनिया भर में फैलाया, जो राष्ट्र की आत्मविश्वासपूर्ण सभ्यतागत भागीदारी और सीखने और आदान-प्रदान के प्रति खुलेपन को दर्शाता है।
उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 1947 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए कहा कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक नागरिक, विशेष रूप से युवाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने छात्रों से राष्ट्र निर्माण में सार्थक योगदान देने का आह्वान भी किया।
उन्होंने तेजी से हो रहे तकनीकी बदलाव पर जोर देते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उभरती प्रौद्योगिकियां सभी क्षेत्रों को बदल रही हैं और इस क्षेत्र में निरंतर सीखने की आवश्यकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से नियमित रूप से अपने कौशल को निखारने, जीवन भर सीखने की मानसिकता अपनाने और अपने मूल विषयों से परे भी नयी तकनीकों से जुड़ने पर जोर दिया। मूल्य आधारित शिक्षा का उल्लेख करते हुए श्री राधाकृष्णन ने कहा कि शैक्षणिक उत्कृष्टता, नैतिकता, सत्यनिष्ठा और सामाजिक जिम्मेदारी पर आधारित होनी चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने कॉलेज परिसर से बाहर के जीवन के बारे में सलाह देते हुए कहा कि सफलता और विफलता जीवन के अभिन्न अंग हैं और वे इसका सामना संतुलन, लचीलेपन और मानसिक शक्ति के साथ करें। उन्होंने छात्रों से जीवन में शार्टकट और असंतुलित तुलनाओं से बचने के लिए कहा और स्नातकों को स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने, लगातार प्रगति करने और अपनी अनूठी क्षमताओं को पहचानने के लिए प्रोत्साहित किया।
उपराष्ट्रपति ने स्नातकों से उद्देश्यपूर्ण और सेवाभावपूर्ण जीवन जीने तथा व्यक्तिगत उत्कृष्टता एवं राष्ट्रीय प्रगति में सामूहिक योगदान देने का आह्वान किया।
