जबलपुर: जिले के धान उपार्जन केंद्रों पर किसानों को अमानक क्वालिटी का डर दिखाकर अवैध वसूली की जा रही है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार केंद्रों पर रखे धान के ढेरों पर बिना किसी आधिकारिक प्रक्रिया के ‘नॉन-एफएक्यू’ की पर्ची चिपका दी जाती है। किसानों को बताया जाता है कि उनकी धान खरीदी योग्य नहीं है, जबकि कुछ समय बाद वही धान मानक गुणवत्ता की घोषित कर दी जाती है। उल्लेखनीय है कि जिले के सभी धान उपार्जन केंद्रों पर गुणवत्ता जांच का कार्य प्राइवेट एजेंसी आरबी एसोसिएट्स को सौंपा गया है। उनके सर्वेयरों की जिम्मेदारी है कि वे तय मापदंडों के अनुसार धान की जांच कर पोर्टल पर स्पष्ट एंट्री करें।
पैसों में बदलती है क्वालिटी
सूत्रों ने बताया कि किसान जब अपनी उपज लेकर केंद्र पहुंचता है, तो पहले उसे धान वापस ले जाने का दबाव बनाया जाता है। इसी दबाव के बीच पैसों के लेनदेन की बात सामने आती है। जैसे ही सौदा तय होता है, वही धान एफएक्यू मान ली जाती है और तुलाई की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। धान उपार्जन में चल रहे इस खेल से किसान खासे परेशान हैं। अब सवाल यह है कि प्रशासन इस गंभीर अनियमितता पर कब सख्त कदम उठाएगा और किसानों को राहत कब मिलेगी।
नियम कागजों तक सीमित
नियमों के अनुसार सर्वेयर को धान की गुणवत्ता जांच कर ई-उपार्जन पोर्टल पर ही उसे स्वीकार या रिजेक्ट करना होता है। अमानक धान होने पर किसान को 24 से 48 घंटे का समय सफाई के लिए दिया जाता है, लेकिन उपार्जन केंद्रों पर इन नियमों का पालन होता नजर नहीं आ रहा है।
सर्वेयर और समिति की संदिग्ध भूमिका
सूत्रों के मुताबिक इस वसूली में सर्वेयर और उपार्जन समिति दोनों शामिल हैं। सर्वेयर प्रति क्विंटल के हिसाब से राशि तय करता है, वहीं समिति तुलाई और स्टैकिंग के नाम पर अतिरिक्त पैसा लेती है, जबकि इन कार्यों के लिए शासन से भुगतान पहले से किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि कई सर्वेयर कार्रवाई के भय से पोर्टल पर धान को औपचारिक रूप से रिजेक्ट नहीं करते। वे मौखिक रूप से या ढेर पर पर्ची चिपकाकर उसे नॉन-एफएक्यू बता देते हैं, जिससे वसूली का रास्ता खुला रहता है और जिम्मेदारी तय नहीं होती।
