बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा: एक महत्वपूर्ण कदम

ऑस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लागू कर दुनिया को चौंका दिया है. यह कदम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि डिजिटल युग की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती,बच्चों की सुरक्षा,को लेकर उठाया गया अब तक का सबसे कठोर और सबसे साहसी कदम है. जिस समय दुनिया भर में सोशल मीडिया कंपनियां मुनाफे और उपयोगकर्ता संख्या को बढ़ाने के लिए हर उम्र के उपयोगकर्ताओं को अपनी ओर खींचने में लगी हैं, उसी समय ऑस्ट्रेलिया ने साफ संदेश दे दिया है कि ‘बच्चों की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक सुरक्षा किसी भी व्यावसायिक हित से ऊपर है. ‘यह निर्णय केवल ऑस्ट्रेलिया तक सीमित नहीं रहेगा. इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय नीति-निर्माण पर पडऩा तय है. यही कारण है कि दुनिया के कई देश अब इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया की घोषणा के तुरंत बाद मलेशिया ने भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध को कैबिनेट स्तर पर मंजूरी दे दी. यह संकेत है कि दक्षिण-पूर्व एशिया इस मुद्दे को अत्यधिक गंभीरता से देख रहा है. यूरोप के अन्य विकसित देश भी पीछे नहीं हैं,डेनमार्क 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रवेश रोकने की तैयारी कर रहा है, जबकि नॉर्वे इस पर गंभीर विचार कर रहा है. न्यूजीलैंड खुलकर कह चुका है कि वह ऑस्ट्रेलिया के मॉडल से प्रेरित है और उसी तरह का कानून लाने पर विचार कर रहा है. यह परिदृश्य बताता है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा केवल एक देश का मुद्दा नहीं, बल्कि एक वैश्विक चिंता बन चुका है.

फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे देशों ने पहले ही नाबालिगों के लिए सख्त आयु-सीमा और माता-पिता की सहमति जैसे नियम लागू कर रखे हैं. फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र के लिए अभिभावक की अनुमति अनिवार्य की है, जर्मनी में 13 से 16 वर्ष के बीच सोशल मीडिया उपयोग अभिभावक की मंजूरी पर निर्भर है, जबकि इटली में 14 साल से कम उम्र के लिए यही व्यवस्था है. यह कदम निश्चय ही बच्चों को संरक्षण देते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया जैसे पूर्ण प्रतिबंध की कठोरता इनमें नहीं है.

चीन ने ‘माइनर मोड’ के ज़रिए स्क्रीन टाइम और कंटेंट एक्सेस को नियंत्रित कर दुनिया को अलग मॉडल दिखाया है. वहीं ब्रिटेन का ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट प्लेटफॉर्म पर जिम्मेदारी डालता है, लेकिन उम्र-आधारित प्रतिबंध अभी वहां नहीं है. इसमें दो राय नहीं कि सोशल मीडिया ने बच्चों पर सबसे ज्यादा मानसिक दबाव डाला है,अवसाद, तुलना की संस्कृति, साइबर बुलिंग, फेक कंटेंट और लत के रूप में यह खतरा लगातार बढ़ता गया है. लाखों अभिभावक असहाय महसूस करते रहे कि आखिर बच्चों को कैसे इस डिजिटल जाल से बचाया जाए. ऐसे में, ऑस्ट्रेलिया का यह कदम कई माता-पिता के मन की आवाज़ है. यहां सवाल उठता है कि क्या पूर्ण प्रतिबंध ही समाधान है ? आलोचक कह रहे हैं कि प्रतिबंध बच्चों को ‘छुपकर’ अकाउंट बनाने के लिए प्रेरित करेगा या डिजिटल कौशल में उन्हें पीछे छोड़ देगा. लेकिन सरकारों का तर्क है कि जब तक सोशल मीडिया कंपनियां सुरक्षित ढांचा नहीं बनातीं, तब तक बच्चों को इस जोखिम भरे माहौल में धकेलना अनुचित है.

भारत दुनिया का सबसे युवा देश है. असुरक्षित डिजिटल कंटेंट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने की संभावना भी यहीं है. ऐसे में भारत को भी अब केवल सलाह और जागरूकता से आगे बढक़र $कानूनी नीतियों पर विचार करना होगा,चाहे वह आयु-सीमा हो, पैरेंटल कंट्रोल हो या प्लेटफॉर्म की जवाबदेही.ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया को दिशा दिखाई है. अब सवाल यह है कि कौन-कौन से देश बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए इसी राह पर चलने का साहस दिखाते हैं.

 

 

Next Post

पाटन-कटंगी थाने का एसपी ने किया निरीक्षण

Fri Dec 12 , 2025
जबलपुर: पुलिस अधीक्षक सम्पत उपाध्याय ने पाटन का वार्षिक तो कटंगी कटंगी का औचक निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने हवालात, मालखाना, जप्ती माल, आम्र्स एम्यूनेशन, राईट ड्रिल सामग्री, संधारित किये जाने वाले रजिस्टरों को चैक किया। सीएम हैल्प लाईन एवं जनसुनवाई की शिकायतों का संतुष्टीपूर्ण निकाल करने के निर्देश दिए। […]

You May Like

मनोरंजन