
रायसेन। विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी सांची में स्थित चैत्यगिरी विहार मंदिर में दो-दिवसीय महाबोधि महोत्सव का शुभारंभ हुआ। भगवान गौतम बुद्ध के परम शिष्य महामोदग्लायन और सारिपुत्र की पवित्र अस्थियों की पूजा-अर्चना के साथ महोत्सव की शुरुआत की गई तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व सम्राट अशोक द्वारा निर्मित सांची स्तूप भारत के प्राचीनतम बौद्ध स्मारकों में से एक है। बाद में शुंग और सातवाहन शासकों ने इसका विस्तार किया। 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अस्थि कलश स्थापना कार्यक्रम में भाग लेकर इसे विशेष आयोजन का रूप दिया, जो आज वैश्विक बौद्ध समुदाय के लिए सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव बन चुका है।
सुबह 8 बजे महाबोधि सोसाइटी से यात्रा निकाली गई जो की सुबह 9:00 बजे चैत्यगिरी बिहार मंदिर पहुंची। इसमें वियतनाम, श्रीलंका, जापान, अमेरिका, सिंगापुर सहित कई देशों के बौद्ध भिक्षु और श्रद्धालु शामिल हुए। कार्यक्रम में प्रदेश के मंत्री प्रहलाद पटेल और सांची विधायक डॉ. प्रभुराम चौधरी भी मौजूद रहे।
सांची के दुर्लभ अस्थि कलशों के दर्शनों का अवसर
सांची स्तूप में भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्यों सारिपुत्र और महामोदग्लायन की पवित्र अस्थियां रखी हैं। इन्हें श्रद्धालुओं के लिए वर्ष में केवल एक बार—इसी महोत्सव के दौरान—दो दिन तक सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्शन के लिए बाहर निकाला जाता है।
मंत्री प्रह्लाद पटेल हुए शामिल
अस्थि कलश की पूजा-अर्चना के इस पवित्र अवसर पर मध्य प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास तथा श्रम विभाग के कैबिनेट मंत्री प्रहलाद पटेल ने भाग लिया। उनके साथ बौद्ध सोसाइटी के प्रमुख विमल नायक और उपतिस थेरोनायक भी उपस्थित रहे।मंत्री पटेल ने कहा कि 30 नवंबर का दिन सांची के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 73 साल पहले, 30 नवंबर को, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने महाबोधि समिति के अध्यक्ष के रूप में अपने सिर पर कलश रखकर एक यात्रा शुरू की थी। उस समय देश के प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति भी मौजूद थे।
