सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का ताज़ा फैसला लोकतंत्र की मर्यादा और शासन व्यवस्था की साख को मजबूत करने वाला है. लंबे समय से कई राज्यों में निर्वाचित सरकारों और राजभवन के बीच टकराव की स्थिति बनी रही, जहां राज्यपालों द्वारा विधेयकों को महीनों तक लंबित रखा गया. अदालत ने इस प्रवृत्ति पर सख्त नाराज़गी जताते हुए साफ कर दिया है कि राज्यपाल के पास विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोककर रखने का कोई अधिकार नहीं है.अनुच्छेद 200 की व्याख्या करते हुए शीर्ष अदालत ने तीन विकल्पों को ही संवैधानिक माना है,विधेयक को मंजूरी देना, उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजना, या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना. अदालत ने कहा कि इन तीन रास्तों के अलावा किसी विधेयक को ‘ठंडे बस्ते’ में डालकर निष्क्रियता दिखाना संविधान की भावना के विरुद्ध है. यह स्पष्ट रेखांकन उन राज्यों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, जहां राजनीतिक मतभेदों के कारण राजभवन विधाई प्रक्रिया के बीच बाधा बनता गया. इस फैसले का पहला बड़ा संदेश है,जवाबदेही. राज्यपाल कोई राजनीतिक पर्यवेक्षक नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रहरी हैं. जनता द्वारा चुनी गई सरकार के कामकाज को अटकाना न तो नैतिक है और न ही संवैधानिक. सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर निर्णायक रोक लगा दी है, जो लोकतंत्र की बड़ी जीत है.
दूसरा, अदालत ने सहयोगी संघवाद की अनिवार्यता पर जोर दिया है. राज्यों की विधानसभाएं जनता की अदालत से सीधे जुड़ी होती हैं. यदि राज्यपाल ही विधायी प्रक्रिया को रोकते रहें, तो पूरा तंत्र अविश्वास और खींचतान का अखाड़ा बन जाता है. न्यायालय का यह फैसला राजभवन को यह याद दिलाता है कि वह केंद्र की नीति का विस्तार भर नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक संस्था है, जिसका कर्तव्य निर्वाचित सरकार के साथ समन्वय बनाकर चलना है. तीसरा, सुप्रीम कोर्ट ने भले कोई सख्त समय सीमा न तय की हो, लेकिन यह जरूर कहा है कि यदि राज्यपाल को किसी विधेयक पर आपत्ति है, तो उसे ‘जितनी जल्दी हो सके’ वापस भेजा जाए. यह टिप्पणी उन अनावश्यक देरी और प्रशासनिक उदासीनता पर सीधा प्रहार है, जिनके कारण कई बार शासन व्यवस्था ठप पड़ जाती है. यह फैसला राज्यपालों के लिए एक स्पष्ट नसीहत भी है. यह याद रखने की जरूरत है कि राजभवन राजनीतिक रणनीतियों का विस्तार नहीं है. राज्यपालों से अपेक्षा है कि वे राजनीतिक तटस्थता का पालन करें, जनता के जनादेश का सम्मान करें और संविधान की मर्यादा में रहते हुए कार्य करें. ‘स्पीड पोस्ट’ की तरह समयबद्ध प्रक्रिया अपनाना ही राजभवन की मर्यादा और जनता के विश्वास दोनों की रक्षा करेगा.
राजभवन और सचिवालय के बीच संवाद की कमी से पैदा होने वाले टकराव अब समाप्त होने चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भारतीय संविधान किसी पदाधिकारी को असीमित अधिकार नहीं देता. अब राज्यपालों पर जिम्मेदारी है कि वे इस फैसले की आत्मा को समझें और संवैधानिक गरिमा का पालन सुनिश्चित करें. निश्चित ही, यह फैसला लोकतंत्र को मजबूत करेगा और केंद्र-राज्य संबंधों में जरूरी सामंजस्य की राह खोलेगा. यह न केवल संवैधानिक मर्यादाओं को पुनर्स्थापित करता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि जनता की इच्छा सर्वोपरि है और उसे रोकने की कोई गुंजाइश अब शेष नहीं है.
