
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष शुक्रवार को मध्य प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से गुरुवार को अधूरी रह गई बहस को पूरा किया गया। दलील दी गई कि राज्य शासन द्वारा प्रमोशन में आरक्षण की जो नई नीति जारी की गई है, उसमें सुप्रीम कोर्ट की गाईड लाईन का पालन नहीं किया जा रहा है। इतना ही नहीं बिना आंकड़े जुटाए प्रमोशन पालिसी लागू की जा रही है, जो कि अनुचित है। याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के प्राय: सभी संबंधित न्यायदृष्टांत रेखांकित कर दिये, आगे नई नीति की असंवैधानिकता के बिंदु पर बहस की जाएगी। इसके बाद राज्य शासन की ओर से नई नीति के पक्ष में बहस को गति दी जाएगी। हाईकोर्ट ने शुक्रवार की सुनवाई के बाद अगली सुनवाई दिसंबर के प्रथम सप्ताह में नियत कर दी।
उल्लेखनीय है कि भोपाल निवासी डॉ. स्वाति तिवारी व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं में मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2025 को चुनौती दी गई है। दलील दी गई कि वर्ष 2002 के नियमों को हाईकोर्ट के द्वारा आरबी राय के केस में समाप्त किया जा चुका है। इसके विरुद्ध मप्र शासन ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी लंबित है, इसके बावजूद मप्र शासन ने महज नाम मात्र का शाब्दिक परिवर्तन कर जस के तस नियम बना दिए। मामले की सुनवाई दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से हाईकोर्ट को अवगत कराया गया कि जरनैल सिंह के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने एम नागराज केस के निर्णय का पुनर्मूल्यांकन किया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि आक्षरण का समुचित लाभ तय करने के लिए उच्च पदों पर पहुंचे अधिकारियों का डेटा आवश्यक है। जब तक क्रीमीलेयर के वास्तविक आंकड़े नहीं जुटाए जाते, तब तक यह पता करना कठिन है कि पिछड़े वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व मिल रहा है या नहीं। जिस कारण प्रमोशन में आरक्षण देने से पहले सरकार को यह साबित करना होगा कि संबंधित वर्गों का प्रतिनिधित्व कम है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि मप्र शासन ने प्रमोशन में आरक्षण लागू करने से पूर्व यह डेटा एकत्र नहीं किया था। पिछड़े वर्गों की स्थिति, प्रतिनिधित्व और क्रीमी लेयर का आकलन नहीं किया गया था। वर्ष 2025 का यह नया नियम संविधान के अनुच्छेद-14 और 16-1 के विरुद्ध है। कुल मिलाकर बिना डेटा जांच के आरक्षण लागू नहीं कया जा सकता। याचिकाकर्ता सपाक्स की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश कौशिक व जबलपुर के अधिवक्ता अमोल श्रीवास्तव ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि 20 और 21 की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की गाईड लाईन से अवगत करवाया गया है। न्यायालय को बताया गया कि प्रमोशन को एक स्तर के ऊपर दिया जाए, तो रिजर्वेशन काउंटर प्रोटेक्टिव होगी। एक ऐसी क्लास खड़ी कर देगी, जो कि बराबरी से ऊपर उठ जाएगी। उससे फिर दोष पैदा होगेए जो कि आर्टिकल 14 और 16 के सिद्धांत के अनुसार नहीं होगी।
