भोपाल। गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने बुधवार प्रातः उत्कृष्ट चर्या का पालन करते हुए केशलोच की धार्मिक प्रक्रिया संपन्न की। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि जैन साधुओं के 28 मूलगुणों में से एक यह प्रमुख गुण है। इसमें साधु स्वयं अपने सिर, मूंछ और दाढ़ी के बाल कंडे की राख के सहारे उखाड़ते हैं। यह परंपरा भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर और आचार्यों तक निरंतर चली आ रही है। इसका उद्देश्य शरीर के प्रति मोह त्यागकर अहिंसा व्रत का पालन करना है। प्रत्येक साधु स्वावलंबी रहे और किसी पर आश्रित न हो, इसी भावना से केशलोच किया जाता है। शास्त्रों में इसकी अवधि चार, तीन और दो माह बताई गई है; मुनि श्री प्रत्येक दो माह में इसे करते हैं।
