भोपाल: यदि किसी अधिकारी को तहसीलदार का वेतन देकर उससे पटवारी का कार्य कराया जाए तो यह गंभीर वित्तीय अनियमितता मानी जाएगी। लेकिन प्रदेश के शासकीय कर्मचारियों के साथ ठीक यही स्थिति बनी हुई है। तीसरा और चौथा समयमान वेतनमान मिलने के बावजूद उनसे उनके वास्तविक पदोन्नति स्तर का कार्य नहीं लिया जा रहा है।
नियमों के अनुसार, समयमान वेतनमान उसी कर्मचारी को मिलता है जो पदोन्नति की सभी शर्तें पूरी करता हो। इसके लिए बाकायदा विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की प्रक्रिया भी होती है। ऐसे में जब कोई कर्मचारी तीसरा या चौथा समयमान वेतनमान प्राप्त कर लेता है, तो उसे संबंधित पदनाम और जिम्मेदारी भी मिलनी चाहिए। सामान्य प्रशासन विभाग इस संबंध में परिपत्र जारी कर सभी विभागों को अधिकृत कर चुका है।
राज्य प्रशासनिक सेवा, कोष एवं लेखा, स्वास्थ्य, शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग जैसे कई संवर्गों में यह व्यवस्था लागू भी हो चुकी है। इन विभागों में पदोन्नति संबंधी विवाद का समाधान आसानी से हो गया। इसके बावजूद अन्य विभागों के अधिकारी स्वीकृत पदों की संख्या या खाली पदों की समस्या बताकर इस व्यवस्था को लागू करने से बचते हैं।
असल में यह संकट छोटे कर्मचारियों तक सीमित है। प्रथम और द्वितीय श्रेणी अधिकारियों के लिए कोई समस्या नहीं है। उन्हें समयमान के साथ उच्च पदनाम भी मिल जाता है और नियमित पदोन्नति की आवश्यकता नहीं रह जाती। यही दोहरी व्यवस्था छोटे कर्मचारियों में गहरी नाराज़गी और असमानता का कारण बन रही है।
