विलुप्त हो रही सांझा फूली के गीत अब नहीं सुनाई देते

खंडवा। निमाड़ में कई परंपरागत संस्कृतियां विलुप्त हो रही हैं। इन्हें संजोने और संरक्षित करने के लिए कुछ खास नहीं हो रहा है। काठी नृत्य विलुप्त हो चुका है।

श्राद्ध पक्ष में सांझा फूली भी कुछ घरों में ही शेष रह गया है। अब ना काठी नृत्य वालों के पैर लोगों के आंगन में थिरकते हैं, न ही सांझा फूली के गीत आज की लड़कियों के होठों पर बुदबुदाये जाते हैं।

सांझा फूली को जीवित रखने की कोशिश

इस सबके बावजूद पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय के परिजन अब भी सांझा फूली को अमर बनाने के प्रयास में जुटे हुए हैं। निमाड़ से दूर राजधानी के बैरागढ में आज भी नियमित सांझा फूली बना रही है।

हर संस्कृति का संरक्षण

राज्य शिखर सम्मान से सम्मानित कालमुखी के उपाध्याय परिवार की बेटी पूर्णिमा चतुर्वेदी निमाड़ में होने वाले हर संस्कृति पर्व मानती हैं। अपनी पोती अक्षवी पारस चतुर्वेदी को उनकी कहानी सुनती हैं। भित्ति चित्रों के साथ गायन व नृत्य सिखाती हैं। वे देश के अनेक शहरों में शिविर में भित्ति चित्रों की प्रदर्शनी लगाकर प्रशिक्षण भी देती है। निमाड़ की संस्कृति के प्रचार प्रसार की प्रेरणा उन्हे अपने दादा लोक संस्कृति पुरुष पंडित राम नारायण उपाध्याय ( पद्मश्री व साहित्य वाचस्पतिद्ब ) से मिली।

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