
इंदौर. केंद्रीय जेल से शुक्रवार को 10 बंदी अपनी सजा पूरी कर रिहा हुए, जिनमें एक महिला बंदी भी शामिल है. लंबे इंतज़ार के बाद जब वे खुले आसमान के नीचे पहुंचे, तो आंखों में घर लौटने की चमक और दिल में नए जीवन का संकल्प साफ झलक रहा था.
जेल प्रशासन ने रिहाई के अवसर पर एक कार्यक्रम आयोजित कर बंदियों को अपराध से दूरी बनाए रखने और जेल में सीखे कौशल को रोज़गार में बदलने की प्रेरणा दी. रिहा हुए बंदियों में कोई 15 साल तो कोई 20 साल तक सलाखों के पीछे रहा. रिहा हुए बंदियों में निहाल सिंह पिता कालू सिंह ने नव भारत को बताया कि जेल में बढ़ईगिरी सीखी. रिहाई से पहले उन्होंने कहा गलतियों ने मुझे जिंदगी से बहुत दूर कर दिया था, लेकिन यहां रहकर मैंने काम करना सीखा. अब गांव लौटकर फर्नीचर का काम करूंगा. वहीं विजय पिता कमल कुशवाह ने बागवानी में प्रशिक्षण लिया. रिहाई के दौरान उनकी भी आंखें भर आईं उन्होंने भरे गले से कहा कि 15 साल बाद खेत की मिट्टी को फिर से छू पाऊंगा, जेल में रहकर सिखाया है कि मेहनत से ही सम्मान मिलता है. वहीं भुवान सिंह पिता करण सिंह ने बताया कि उन्हों ने हैंडलूम पर कपड़ा बुनना सीखा. उन्होंने कहा यहां सीखा हुनर अब मेरे परिवार का सहारा बनेगा. बाहर जाकर अपना छोटा-सा बुनाई केंद्र खोलना चाहती हूं. दिनेश पिता सुमला ने खाना बनाने में महारत पाई. मुस्कुराते हुए बोले अब अपराध नहीं, सिर्फ किचन में हाथ चलाऊंगा. होटल में नौकरी ढूंढूंगा और परिवार का सहारा बनूंगा. इसके अलावा जाहिद दर्फ भैय्या पिता अहमद हमीद, सचिन उर्फ सलमान उर्फ गोलू पिता विजय चौहान, रतन सिंह पिता बूचर, पूरण उर्फ पूरण सिंह पिता लखन सिंह, अम्बाराम पिता धनिया के साथ ही सुशीला बाई पति बाबूलाल सोनी ने भी जेल में रह कर अन्य पढ़ाई लिखाई के साथ अन्य कौशल शिक्षा भी ली तथा जेल में पढ़ाई-लिखाई की सुविधा का भी कई बंदियों ने लाभ उठाया किसी ने पहली बार अक्षर ज्ञान हासिल किया, तो किसी ने अधूरी पढ़ाई पूरी की. इस मौके पर जेल अधीक्षक अलका सोनकर का कहना है कि हमारा उद्देश्य सिर्फ सजा पूरी करवाना नहीं, बल्कि बंदियों को सुधार के रास्ते पर ले जाना है, ताकि वे समाज में सम्मानजनक जीवन जी सकें. अब सभी बंदी अपने परिवारों के पास लौट रहे हैं. उम्मीद है कि जेल में सीखे गए कौशल और बदले हुए नजरिये के साथ वे समाज में नई पहचान बनाएंगे.
