नयी दिल्ली, 09 अगस्त (वार्ता) कांग्रेस ने कहा है कि चुनाव आयोग को लेकर पहले कई बार संसद में चर्चा हुई है लेकिन यह पहला मौका है जब सरकार संसद में आयोग की भूमिका को लेकर चर्चा कराने से डर रही है।
लोकसभा में कांग्रेस के ह्विप मणिक्कम टैगोर ने संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू को संबोधित कर सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि चुनाव आयोग पर संसद में एक बार नहीं कई बार चर्चा हुई है। पिछले 60-65 साल से चुनाव आयोग में सुधार को लेकर बराबर चर्चा चल रही है।
श्री रिजिजू को संबोधित अपनी पोस्ट में कांग्रेस नेता ने कहा, “संसदीय कार्यमंत्री जी आप संसद में चुनाव आयोग के कामकाज पर चर्चा की अनुमति देने से क्यों डर रहे हैं। यह कोई नयी बात नहीं है, संसद ने दशकों में कई बार चुनाव आयोग के आचरण और चुनाव सुधारों पर चर्चा की है। लोकसभा में बार बार सांसदों ने आयोग को लेकर सवाल उठाए हैं। यहाँ तक कि 1993 में चुनाव स्थगित करने जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रभावशाली फैसलों पर भी संसद के दोनों सदनों में खुलकर चर्चा हुई थी।”
श्री टैगोर ने चुनाव आयोग को लेकर संसद में पहले हुई चर्चाओं का विवरण देते हुए कहा कि राज्यसभा में चुनाव आयोग और चुनाव सुधारों पर बहस 1957 से हो रही है। संसद में चुनाव आयोग को लेकर जो प्रमुख चर्चाएं हुई हैं उनमें चुनाव नियमों को रद्द करना, चुनावों का पुनर्निर्धारण और स्थगन, साल 1970, 1981, 1986, 1991, 2015 में चुनाव सुधारों पर चर्चा, चुनाव में धनबल के प्रयोग और कानूनों में संशोधनों को लेकर हुई चर्चाएं शामिल हैं। सांसदों ने लोकसभा में इन मुद्दों को बार-बार उठाया है और चुनाव सुधार को लेकर तो कई बार 1981, 1983, 1986, 1990, 1995 तथा 2005 चर्चाएं हुई हैं। यही नहीं बिहार और त्रिपुरा में चुनावों का स्थगन, फोटो पहचान पत्र जारी करना, धांधली की जाँच और विदेशी धन के आरोप और यहाँ तक कि 1993 में चुनाव स्थगित करने जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रभावशाली फैसलों पर भी दोनों सदनों में खुलकर बहस हुई थी।
उन्होंने कहा, “पिछली सरकारें छिपती नहीं थीं। उन्होंने संसद का सामना किया और संसद में जवाब दिया। चुनावों में धनबल (1978) से लेकर प्रवासी भारतीयों के लिए प्रॉक्सी वोटिंग (2015) तक, संसद चुनाव आयोग को जवाबदेह ठहराने का मंच रही है, तो फिर मोदी सरकार को अचानक चर्चा से एलर्जी क्यों हो गई है।’’
कांग्रेस नेता ने कहा कि अंधकार में लोकतंत्र दम तोड़ देता है। अगर संसद उस संस्था पर चर्चा नहीं कर सकती जो हमारे चुनाव कराती है, तो जवाबदेही कहाँ रहेगी। उनका कहना था कि श्री रिजिजू को गृहमंत्री अमित शाह द्वारा चुने गए चुनाव आयोग को जाँच से बचाना बंद करना चाहिए। अगर पिछली सरकारों ने बिना किसी डर के इन बहसों की अनुमति दी थी- तो आप क्यों नहीं दे सकते। आप भारत की जनता से क्या छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
