सावन के झूलों की खोती जा रही परंपरा

इंदौर:सावन केवल भक्ति और हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में झूला झूलने की अनूठी परंपरा का प्रतीक भी है. पहले जहां बाग-बगिचों और आंगनों में झूले लगते थे, वहीं आज यह परंपरा आधुनिकता की दौड़ में गुम हो गई है. राजस्थान के गांवों में यह रीति आज भी जीवित है, जहां नवविवाहिता को मिठाई और झूला भिजवाना रिवाज है.

झूला झूलना न केवल आनंददायक है बल्कि यह स्वास्थ्यवर्धक भी है. इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है, मानसिक तनाव घटता है और आंखों का व्यायाम होता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि झूला झूलना पाचन, श्वसन और मस्तिष्क की सक्रियता के लिए भी लाभकारी है.

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