झाबुआ के गांव शादी के बाद वीरान, गुजरात-राजस्थान के शहरों की ओर पलायन कर रहे आदिवासी

झाबुआ: आदिवासी बाहुल जिले में ग्रीष्मकाल में शादियों का सीजन समाप्त होने के बाद एक बार पुनः अंचल में ग्रामीणों का काम के लिए पलायन शुरू हो गया है। जिसके चलते इन दिनों जिले के रेलवे, बस एवं जीप स्टेंड पर ग्रामीणों की भारी भीड़ देखने को मिल रहीं है। ग्रामीणजन अपने परिवार के साथ मजदूरी के लिए गुजरात एवं राजस्थान के बड़े शहरों की और कूच कर रहे है।

ग्रामीण अपने परिवार के साथ मजदूरी के लिए गुजरात के सूरत, राजकोट, अहमदाबाद के साथ राजस्थान के कोटा और उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों के बड़े शहरों की ओर जाते है। यहां ग्रामीणों को मजदूरी करने पर अच्छा पैसा मिलने के साथ भोजन एवं आवास की सुविधा मिलती है। ग्रामीणों से इन शहरों में केमिकल और सीमेंट-पत्थर फेक्ट्री में भी कार्य करवाया जाता है। जिसके कारण वे सिलिकोसिस एवं महिला के गर्भावस्था में होने के दौरान बच्चें समुचित पोषण आहार नहीं मिलने से कुपोषण का भी शिकार होते है। इसके अलावा टीबी जैसी बीमारी से भी ग्रसित होने से ग्रामीणों की असामायिक मृत्यु हो जाती है। ग्रामीणों का पलायन वर्षों से चला आ रहा है।
शासन-प्रशासन के प्रयास विफल
लंबे समय से चली आ रहीं ग्रामीणों की पलायन प्रथा को रोकने में शासन-प्रशासन के साथ राजनैतिक पार्टियों के दावे भी खोखले साबित हो रहे है। वहीं सरकारी योजनाओं का संचालन भी इनके पलायन को नहीं रोक पा रहा है। ग्रामीणों द्वारा अपने परिवार के साथ पलायन पर जाने से बच्चों का शैक्षणिक कार्य भी प्रभावित होता है। ग्रामीणों के पलायन को पूर्णतः रोकने के लिए शासन-प्रशासन और राजनैतिक पार्टियों को धरातल पर कोई ठोस कार्य योजना बनाने एवं पहल करने की आवश्यकता है।
इनका कहना है
गांवों में शासन की योजनाएं जिला प्रशासन के माध्यम से धरातल पर संचालित हो रहीं है। पलायन को रोकने हेतु मॉनिटरिंग करवाई जाएगी।
जितेन्द्रसिंह चौहान, सीईओ, जिपं झाबुआ

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