महाराष्ट्र के सांगली के एक छोटे से गांव नेलकरंजी में घटी एक त्रासदी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. 16 साल की साधना भोसले, जो नीट की तैयारी कर रही थी, उसके मॉक टेस्ट में कम अंक आए. और यही ‘अपराध’ उसकी जान का कारण बन गया. उसके पिता, जो पेशे से शिक्षक हैं, ने उसे इतनी बेरहमी से पीटा कि वह जि़ंदगी की जंग हार गई. यह कोई साधारण घरेलू झगड़ा नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक मानस की गहराई में छिपी एक भयावह सच्चाई को उजागर करता है कि,हमने बच्चों को “सपनों का बोझ” उठाने की मशीन बना दिया है. मौजूदा दौर की शिक्षा व्यवस्था सिर्फ अंक, रैंक और सफल करियर के नाम पर इतनी असंवेदनशील हो गई है कि उसमें बच्चे की रुचि, मानसिक स्वास्थ्य, या आत्म-सम्मान जैसी चीज़ों के लिए कोई जगह नहीं बची है. अभिभावक, जो कभी बच्चों के संरक्षक हुआ करते थे, अब कई बार उन्हें प्रोजेक्ट की तरह ट्रीट करते हैं,जैसे हर बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बनना ही है, वरना वह असफल है.लेकिन क्या कोई परीक्षा का नतीजा किसी इंसान की काबिलियत या जीवन की कीमत तय कर सकता है ?
साधना की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, एक सवाल है हम सबके सामने—हम अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं ? प्यार, समझ और सहारा ? या तनाव, दबाव और भय ? हर माता-पिता को अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की चिंता होती है, यह स्वाभाविक है, लेकिन जब यह चिंता एकतरफा महत्वाकांक्षा में बदल जाती है, तो यह बच्चे के लिए बोझ बन जाती है. कोई भी बच्चा किसी परीक्षा में असफल हो सकता है. जरूरी नहीं कि वह कमज़ोर है, हो सकता है वह किसी और क्षेत्र में असाधारण प्रतिभा रखता हो.हर बच्चा एक जैसा नहीं होता, न ही होना चाहिए. दरअसल, जब हम उन्हें अपने अधूरे सपनों का माध्यम बना देते हैं, तो वह उनकी नहीं, हमारी लड़ाई बन जाती है. और इस लड़ाई में बच्चे अक्सर अकेले पड़ जाते हैं.
धोंडीराम भोसले का पेशा शिक्षक का था,जो शिक्षा देता है, सहारा बनता है, रोशनी दिखाता है.लेकिन जब वही व्यक्ति अपनी बेटी की मौत का कारण बन जाए, तो यह केवल पारिवारिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पराजय भी है. शिक्षक केवल स्कूल में नहीं, घर में भी एक प्रेरणा होता है.अगर वह ही “परफॉर्मेंस” के आधार पर अपने बच्चे को स्वीकार या अस्वीकार करने लगे, तो समाज की रीढ़ ही चरमरा जाती है. बच्चों को दिशा दिखाना माता-पिता का धर्म है, लेकिन रास्ता तय करना बच्चों का अधिकार. उन्हें अपने फैसले लेने दें, गिरने दें, सीखने दें.
अगर वे डॉक्टर न बनें, लेकिन एक संवेदनशील लेखक, सच्चे किसान, ईमानदार दुकानदार, या प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता बनें, तो क्या वह कम है? हमें यह समझना होगा कि हर सफलता सामाजिक प्रतिष्ठा से नहीं, आत्म-संतोष से तय होती है. और हर असफलता जीवन का अंत नहीं, एक नया मोड़ हो सकती है,अगर साथ में किसी का विश्वास हो, सहारा हो. यह घटना किसी एक पिता की गलती नहीं है. यह पूरे समाज के लिए एक दर्पण है. कोचिंग सेंटर, स्कूल, परिवार, रिश्तेदार, सभी मिलकर जिस तरह बच्चों पर सफलता का बोझ डालते हैं, वह बेहद
अमानवीय है. बेटी साधना अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी मौत एक ऐसा प्रश्न छोड़ गई है, जिसे हर माता-पिता को, हर शिक्षक को, हर समाज को अपने भीतर झांक कर देखना चाहिए? कि
क्या हम बच्चों को प्यार कर रहे हैं, या सिर्फ परफॉर्मेंस पर आधारित स्वीकार्यता दे रहे हैं ? उन्हें उडऩे दीजिए. उनका आसमान उन्हें खुद तलाशने दीजिए. आपका दायित्व केवल इतना है कि जब वे गिरें, तो आपका हाथ उनके लिए उठा हुआ हो,न कि डंडा.क्योंकि उड़ान बच्चों की होती है और उन्हें उडऩे देना ही एक सच्चे अभिभावक की पहचान है.
