ईरान – इजरायल युद्ध और अमेरिका

आखिरकार अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच चल रही जंग में शमिल हो गया है.जाहिर है यह कोई रहस्य नहीं है कि अमेरिका और इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने लिए एक गंभीर खतरा मानते रहे हैं. उनका मानना है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ रहा है, जो मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिरता को गंभीर रूप से बिगाड़ सकता है. इसी डर के परिणामस्वरूप, हाल ही में अमेरिका ने “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” के तहत ईरान के फोर्डो, नतांज और इस्फहान स्थित परमाणु ठिकानों पर हमला किया. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इन हमलों को ईरान के परमाणु कार्यक्रम को “पूरी तरह तबाह” करने वाला बताया है और सैटेलाइट छवियों से भी भारी नुकसान के संकेत मिले हैं.

इन अमेरिकी हमलों से पहले, इजरायल भी ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर लगातार हमले कर रहा था. इन इजरायली कार्रवाइयों से ईरान के परमाणु संवर्धन सुविधाओं को नुकसान पहुंचा और कुछ प्रमुख वैज्ञानिकों और अधिकारियों की भी जान गई. इन हमलों का स्पष्ट उद्देश्य ईरान की परमाणु क्षमताओं को कमजोर करना और उसे परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना है.

परमाणु कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ, अब अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान में शासन परिवर्तन की इच्छा भी खुलकर सामने आ रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमलों के बाद स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि वर्तमान ईरानी शासन अपने देश को “फिर से महान” नहीं बना सकता, तो “सत्ता परिवर्तन क्यों नहीं होगा”. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी शुरुआत में खामेनेई की सत्ता को उखाड़ फेंकने की बात कही थी, हालांकि बाद में उनके बयान में थोड़ी नरमी आई.

यह एक गंभीर मोड़ है क्योंकि इसका मतलब सिर्फ परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाना नहीं, बल्कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था को ही बदलना है. ऐसी रिपोर्टें भी हैं कि अमेरिका और इजरायल दोनों अयातुल्ला खामेनेई को सीधे निशाना बनाने पर विचार कर रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि उनकी हत्या के बाद ईरान परमाणु हथियार कार्यक्रम से पीछे हट सकता है. यह ईरान के लिए एक बड़ा खतरा है, और यही कारण है कि ईरान इन देशों को क्रमश: “बड़ा शैतान” और “छोटा शैतान” कहता है.

अमेरिका और इजरायल का यह आक्रामक रुख निश्चित रूप से ईरान के अंदर प्रतिक्रिया को जन्म देगा. ईरान पहले ही संकेत दे चुका है कि वह परमाणु अप्रसार संधि एनपीटी से बाहर निकल सकता है, जो स्थिति को और भी जटिल बना देगा. सवाल यह है कि क्या ये हमले ईरान को अपने परमाणु महत्वाकांक्षाओं से पीछे हटने पर मजबूर करेंगे, या वे उसे और अधिक कट्टरपंथी और अप्रत्याशित बना देंगे?

एक तरफ, इन कार्रवाइयों का लक्ष्य मध्य पूर्व को परमाणु हथियारों से सुरक्षित रखना है. दूसरी तरफ, शासन परिवर्तन का प्रयास एक संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इससे न केवल ईरान में उथल-पुथल मच सकती है, बल्कि पूरे क्षेत्र में एक बड़ा संघर्ष छिड़ सकता है, जिसमें अन्य क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां भी शामिल हो सकती हैं.

यह समय है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस स्थिति को अत्यंत गंभीरता से ले. केवल सैन्य कार्रवाई और शासन परिवर्तन की इच्छा से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता. कूटनीति, संवाद और बहुपक्षीय बातचीत ही एक ऐसा रास्ता हो सकता है जो इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करे, बजाय कि इसे एक और विनाशकारी संघर्ष की ओर धकेले. ईरान को भी अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करना चाहिए और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को उसके साथ एक समाधान खोजने के लिए मिलकर काम करना चाहिए जो सभी पक्षों की सुरक्षा चिंताओं को दूर करे.

 

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