भू-राजनीतिक तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड $76 प्रति बैरल के पार; भारत की उच्च आयात निर्भरता से बढ़ रही चिंताएं, शिपिंग लागत और मुद्रास्फीति का खतरा।
नई दिल्ली, 18 जून (वार्ता): ईरान और इजरायल के बीच जारी सैन्य संघर्ष का असर अब वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने के कारण पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल की कीमतें उछलकर पांच महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा लागत बढ़ने की आशंकाएं गहरा गई हैं। यह स्थिति भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों के लिए विशेष चिंता का विषय है, क्योंकि यहां पेट्रोल और डीजल की कीमतें सीधे वैश्विक कच्चे तेल के मूल्यों से जुड़ी हुई हैं।
मौजूदा जानकारी के अनुसार, बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 7% से अधिक बढ़कर $76 प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी $75 प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है। ईरान, दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है, और भले ही उस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध लगे हुए हैं, युद्ध के व्यापक होने से उसकी तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसके अलावा, होरमुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के एक बड़े हिस्से के तेल व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, में किसी भी व्यवधान से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह संघर्ष और बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतें $100 से $120 प्रति बैरल या उससे भी अधिक तक जा सकती हैं।
भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 89% आयात करता है, जिससे वह वैश्विक तेल मूल्य में उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। कच्चे तेल की कीमतों में $10 प्रति बैरल की वृद्धि से भारत के आयात बिल में अरबों डॉलर का इजाफा हो सकता है, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। उच्च तेल कीमतें ईंधन और परिवहन लागत को बढ़ाती हैं, जिससे खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी प्रभावित होती हैं, जो अंततः मुद्रास्फीति को बढ़ावा देती हैं। हालांकि, भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारी स्थिति पर कड़ी नजर रख रहे हैं और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों को तलाशने की बात कह रहे हैं। भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध बनाया है और ब्राजील, गुयाना, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों से भी तेल प्राप्त कर रहा है। इसके अलावा, देश के पास कुछ हफ्तों की ईंधन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त भंडार मौजूद हैं। हालांकि, शिपिंग और बीमा दरों में वृद्धि के कारण माल ढुलाई की लागत बढ़ने से भी ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ब्रेंट क्रूड $80 प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है और भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव बन सकता है।

